छंद
खेल भीषण खेलते।
दानवी मन देखते।
दर्द पीडा नाश का–
भ्रांत पांसा फेंकते।।
नाश का अब शोर है।
शेष टूटी डोर है।
राख भी अब खाक-सी,
ढूँढती अब छोर हैं।
खेल भीषण खेलते।
दानवी मन देखते।
दर्द पीडा नाश का–
भ्रांत पांसा फेंकते।।
नाश का अब शोर है।
शेष टूटी डोर है।
राख भी अब खाक-सी,
ढूँढती अब छोर हैं।