कुण्डली/छंद

छंद

खेल भीषण खेलते।

दानवी  मन  देखते।

दर्द पीडा नाश का–

भ्रांत पांसा फेंकते।।

नाश का अब शोर है।

शेष   टूटी   डोर   है।

राख भी अब खाक-सी,

ढूँढती  अब   छोर  हैं।

*चंचल जैन

मुलुंड,मुंबई ४०००७८