कविता

पीली धूप का इंतज़ार

सन्नाटे अब विचलित नहीं करते,
शायद समय ढलान पर है।
फिर भी धड़कते हैं सुप्त विचार,
घने काले बादलों की दीवार लाँघ
उदास नदी-नालों के पास चले आते हैं।

खूंटी पर टंगे कुछ अधूरे सपने
अब बदरंग हो गए हैं।
जिंदगी ठहर-सी गई है
गर्म रेत पर खड़े-खड़े।

तोड़ नहीं पाता बेड़ियाँ,
फिर भी चाहता हूँ
उम्र की पगडंडी पर रंग भर दूँ—
जो अब तक हाशिये पर रही,
जहाँ इंद्रधनुषी ख्वाब सजे थे,
वे अब भी धीरे-धीरे करवट लेते हैं।

बंद कमरे के बिस्तर पर
रहता है पीली धूप का इंतज़ार।
ताज़ी हवा की कल्पना से
मन नर्तन करने लगता है।

शब्दों के पैरों में बाँधे थे जो घुँघरू,
अब क्यों नहीं बजते?
लहरें अब आँसू बन गई हैं।

शब्द फिर झंकृत होंगे—
जैसे जेल में भी धूप खिलती है,
जैसे वहाँ भी हवा जीवित रहती है;
वैसे ही
जीवित रहने की कशिश
जड़ता की दीवारें तोड़ देगी।

— उमाकांत भारती

उमाकांत भारती

जन्म : 10 सितम्बर 1948 ई. कृतियाँ- ममता की मूर्ति, प्रतिशोध, कैसे कहूँ, बदलते रिश्ते, काला दिन, बुढ़ापे का गणित, नया बेटा विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में 100 से अधिक कहानियाँ प्रकाशित। लघुकथायें एवं कवितायें भी प्रकाशित। आकाशवाणी से कहानी, लघुकथा, आलेख प्रसारित। सम्पादन- पलाश अर्द्धवार्षिक का 2014 से सम्पादन सम्पर्क- मेहता निवास, नया टोला, भीखनपुर, गुमटी नं. 12 के पास, भागलपुर-812001 बिहार सचल दूरभाष- 9608228922 E-mail umakantsingh34535@gmail.com