पीली धूप का इंतज़ार
सन्नाटे अब विचलित नहीं करते,
शायद समय ढलान पर है।
फिर भी धड़कते हैं सुप्त विचार,
घने काले बादलों की दीवार लाँघ
उदास नदी-नालों के पास चले आते हैं।
खूंटी पर टंगे कुछ अधूरे सपने
अब बदरंग हो गए हैं।
जिंदगी ठहर-सी गई है
गर्म रेत पर खड़े-खड़े।
तोड़ नहीं पाता बेड़ियाँ,
फिर भी चाहता हूँ
उम्र की पगडंडी पर रंग भर दूँ—
जो अब तक हाशिये पर रही,
जहाँ इंद्रधनुषी ख्वाब सजे थे,
वे अब भी धीरे-धीरे करवट लेते हैं।
बंद कमरे के बिस्तर पर
रहता है पीली धूप का इंतज़ार।
ताज़ी हवा की कल्पना से
मन नर्तन करने लगता है।
शब्दों के पैरों में बाँधे थे जो घुँघरू,
अब क्यों नहीं बजते?
लहरें अब आँसू बन गई हैं।
शब्द फिर झंकृत होंगे—
जैसे जेल में भी धूप खिलती है,
जैसे वहाँ भी हवा जीवित रहती है;
वैसे ही
जीवित रहने की कशिश
जड़ता की दीवारें तोड़ देगी।
— उमाकांत भारती
