ग़ज़ल
ख़्वाब पलकें नए बो रही आज कल।
शाम रानानियाँ जो रही आज कल
दिल में यादों का इक कारवाँ चल पड़ा,
रूह ख़ामोशियाँ सो रही आज कल।
चाँद भी बादलों में छुपा है कहीं,
रात तन्हाइयाँ हो रही आज कल।
दर्द लफ़्ज़ों में ढलकर बिखरने लगा,
नज़्म रूठी हुई रो रही आज कल।
झूठ चेहरों पे ऐसे सजा है यहाँ,
सच की आँखें नमी खो रही आज कल।
लोग अपनों से कटकर खड़े हैं यहाँ,
भीड़ रिश्तों को अब ढ़ो रही आज कल।
ऐ ‘मृदुल’ ये फ़िज़ा भी अजब हो गई,
रंग ख़ुशियों के सब धो रही आज कल॥
— मंजूषा श्रीवास्तव ‘मृदुल’
