गीतिका/ग़ज़ल

ग़ज़ल

ख़्वाब पलकें नए बो रही आज कल।
शाम रानानियाँ जो रही आज कल

दिल में यादों का इक कारवाँ चल पड़ा,
रूह ख़ामोशियाँ सो रही आज कल।

चाँद भी बादलों में छुपा है कहीं,
रात तन्हाइयाँ हो रही आज कल।

दर्द लफ़्ज़ों में ढलकर बिखरने लगा,
नज़्म रूठी हुई रो रही आज कल।

झूठ चेहरों पे ऐसे सजा है यहाँ,
सच की आँखें नमी खो रही आज कल।

लोग अपनों से कटकर खड़े हैं यहाँ,
भीड़ रिश्तों को अब ढ़ो रही आज कल।

ऐ ‘मृदुल’ ये फ़िज़ा भी अजब हो गई,
रंग ख़ुशियों के सब धो रही आज कल॥

— मंजूषा श्रीवास्तव ‘मृदुल’

*मंजूषा श्रीवास्तव

शिक्षा : एम. ए (हिन्दी) बी .एड पति : श्री लवलेश कुमार श्रीवास्तव साहित्यिक उपलब्धि : उड़ान (साझा संग्रह), संदल सुगंध (साझा काव्य संग्रह ), गज़ल गंगा (साझा संग्रह ) रेवान्त (त्रैमासिक पत्रिका) नवभारत टाइम्स , स्वतंत्र भारत , नवजीवन इत्यादि समाचार पत्रों में रचनाओं प्रकाशित पता : 12/75 इंदिरा नगर , लखनऊ (यू. पी ) पिन कोड - 226016