राजनीति

युद्ध का अंत, असंभव : बांस भी रहेगा और बांसुरी भी बजती रहेगी

बचपन में पिताजी से दूसरे महा विश्व युद्ध के बारे में कुछ बातें सुनते थे। जब थोड़े बड़े हुए स्कूल कॉलेज जाने लगे तो देखा कि विश्व के किसी ने किसी कोने में युद्ध अविराम चलता ही रहता है , वियतनाम का युद्व भी समाचारों में काफी सुनने पढ़ने को मिला,
1947,1962, 1965 और 1971 में पाकिस्तान से लड़ाई फिर 1971 भारत-पाकिस्तान की लड़ाई, इराक ईरान की लड़ाई अफगानिस्तान रूस की लड़ाई । ऐसे ही
देखा जाए तो लगातार कहीं न कहीं विश्व में लड़ाई ,आतंकवाद का दौर चलता ही रहता है, और जबतक कट्टरवादी विचारधारा वाले लोग दुनिया में रहेंगे और हथियार, उपकरण,और अन्य प्रकार की सैन्य सामग्री बनाने और बेचने वाले इसे पूरे विश्व में उपलब्ध कराते रहेंगे, युद्ध अविराम चलता ही रहेगा,केवल स्थान बदल जाएगा। इससे
किसको क्या मिला, केवल बर्बादी जान और माल की, अशांति दुख दर्द, अपने के बिछड़ने का ग़म, अनाथ परिवार,

जब तक विश्व के सभी देश अपनी रक्षा ,सुरक्षा और ताकत दिखाने के लिए हथियार खरीदते रहेंगे, सैन्य सामान बनाते रहेंगे ,तब तक ऐसा सामान बनाने वाले बनते रहेंगे और अपना सामान बेचने के लिए कहीं ना कहीं विश्व में इस प्रकार के हालात पैदा करते रहेंगे कि उनके हथियार बिकते रहे। पर हथियार न बने ना बिके ऐसा बिल्कुल असंभव लगता है। ना रहेगा पास न बजेगी बांसुरी की कहावत यहां बिल्कुल झूठी साबित होती है। आपका क्या विचार है।

— जय प्रकाश भाटिया

जय प्रकाश भाटिया

जय प्रकाश भाटिया जन्म दिन --१४/२/१९४९, टेक्सटाइल इंजीनियर , प्राइवेट कम्पनी में जनरल मेनेजर मो. 9855022670, 9855047845