मुक्तक/दोहा

समकालीन दोहे

प्यासे को पानी मिला अधरों की मुस्कान।
बस इतनी सी चाहत लिए फिरें इंसान।।
गांवों में अब है कहां, हरियाली की आस।
सांसों में जिन्दा बची होंठों की यह प्यास।।
ढाई आखर न पढ़े मन का जो शैतान।
कबिरा को झूठा कहे चलता सीना तान।।
बेल घृणा की बो रहे उन्मादी शैतान।
जनता को देते रहे नफ़रत का पैगाम।।
तुम मुझसे नफ़रत करो किन्तु करूं मैं प्यार।
अपनी – अपनी दृष्टि है अपना है संसार।।
अपनी बस्ती में लगी एक अनोखी आग।
बाकी सब हैरान थे उसने गाये फाग।।
अपने गांवों में बचा अब भी थोड़ा प्रेम।
दूर शहर में पूछता कोई कुशल न क्षेम।।
मंदिर-मस्जिद के लिए हुए सियासी काज।
जनता के दिल पर करे वेद हमेशा राज।।

— वाई. वेद प्रकाश

वाई. वेद प्रकाश

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