ख़ामोशी कब ज़रूरी है
शब्द जब थक जाएँ,
मन स्वयं से बातें करे,
मौन धीरे उतर आए।
भीड़ के शोर में जब
अर्थ खोने लगें,
मौन ही सहेज ले सत्य।
पीड़ा जब गहरी हो,
आँसू शब्द न बन पाएँ,
मौन ही कहानी कहे।
क्रोध जब उमड़ पड़े,
वाणी डगमगाने लगे,
मौन ही संभाल ले।
रिश्ते जब बिखरें,
तर्क भी हार जाए,
मौन फिर जोड़ जाए।
सत्य जब कठोर हो,
दिल उसे न सह पाए,
मौन उसे सहलाए।
रात जब गहराए,
विचार उलझने लगें,
मौन उन्हें सुलझाए।
जीवन की राह में
जब दिशा न सूझे,
मौन ही प्रश्न बन जाए।
— डॉ. अशोक
