कविता

स्वास्थ्य श्रेष्ठ संपदा

पुरानी आदतों के अभ्यस्त,
इतनी चिताओं में हो ग्रस्त,
अच्छा स्वास्थ्य श्रेष्ठ संपदा,
जिंदगी में अपने रहो मस्त ।

दिनचर्या न हो अस्त-व्यस्त,
वरना हो जाओगें रोगग्रस्त,
फायदा कम नुक़सान ज्यादा,
चुस्त-दुरुस्त रहो मुक्तहस्त ।

चाहे कितने भी हो व्यस्त,
ढ़ेरों जिम्मेदारियों से त्रस्त,
रखो सेहत को बकायदा,
बिमारियों को करों ध्वस्त ।

जिंदगी ने किया हो पस्त,
और हालात भी हो खस्त,
फिर भी न तोड़ना वादा,
तन-मन स्वस्थ हो समस्त ।

हर पल “आनंद” अलमस्त,
स्वस्थ्य प्रसन्न मन जबरदस्त,
करो तन मन धन से हर सेवा,
शीश पर माई का वरदहस्त ।

— मोनिका डागा “आनंद”

*मोनिका डागा 'आनंद'

चेन्नई, तमिलनाडु