उत्पत्ति स्थान से खिलवाड़
खामोश थीं दीवारें, पर ‘दर्द’ चीख रहा था,
ये इंसान ही इंसान को नीचे गिरा रहा था।
क्यों? स्त्री जननांग से ‘कुत्सित’ खिलवाड़,
उत्पत्ति स्थान, यौन हिंसा की लें रहें आड़।
जिसे अपना माना था, वही ‘ज़ख्म’ दे गया,
विश्वास की नींव एक पल में ही तोड़ गया।
आँखों में थे खूब सवाल पर होंठ सिल गए,
दर्द के अंधेरे में सारे सपने ख़ाक मिल गए।
हर रात के बाद एक सुहानी सुबह आती है,
जो टूटी हुई हिम्मत फिर रोशनी जगाती है।
खामोशी नहीं, बुलन्द आवाज़ उठानी होगी,
अब अन्याय के खिलाफ जंग लड़नी होगी।
हर एक आँसू का हिसाब तो होगा एक दिन,
सत्य, हिम्मत से ही मिलेगा ‘न्याय’ एक दिन।
(संदर्भ – लुधियाना में पति की हैवानियत, कैमरे में दरिंदगी कैद)
— संजय एम तराणेकर
