चेहरों से नक़ाब उतर गए
‘महिला आरक्षण’ का सपना फिर अधूरा रह गया,
संसद के गलियारों में सच जल की तरह बह गया।
बड़ी-बड़ी बातें करने वाले, खामोश से क्यों हो गए,
नकाबों के पीछे छिपे चेहरे आज ‘उजागर’ हो गए।
ये विपक्षी मंचों पर नारी सम्मान का पाठ पढ़ाते थे,
आज वहीं अवसर आने पर कदम पीछे हटा रहें थे।
अपने वोटों की राजनीति, ‘वादे-इरादे’ सब भूल गए,
महिलाओं के हक़ की बात हुई तो रास्ते बदल गए।
कहाँ गईं बेटी जो कहती -‘लड़की हूँ लड़ सकती हूँ’,
क्या? अब माँ, माटी, मानुष की बात कर सकती हूँ।
अब किस मुँह से महिलाओं से वो कर पाएगी बात,
महिला होके हक़ पे डाका डालकर खा गईं सौगात।
ये गिरना सिर्फ एक बिल का नहीं, भरोसे का भी है,
जनता की ‘उम्मीदों’ के टूटते हुए ‘हिस्सों’ का भी है।
अब वक्त है पक्ष पहचानने का असली कौन खड़ा है,
नकाबों के पीछे छुपा नकली चेहरा कितना बड़ा है।
(संदर्भ – महिला आरक्षण बिल)
— संजय एम तराणेकर
