बचपन
चोट लगती जब किसी को, रोने लगता दूसरा,
दर्द के भी दर्द का अहसास करना सीखिए।
छल कपट अहंकार क्या, जाने नहीं बचपना,
प्यार का संसार सारा, बचपने से सीखिए।
पचपन
मार कर ठोकर किसी को, ख़ुशी का अहसास हो,
उठते हुए को गिरा कर, गर खुशी का अहसास हो,
ऐसा न पचपन हो हमारा, कोई पीड़ित हमसे रहे,
हमारी उपस्थिति से सभी को, खुशी का अहसास हो।
बुढापा
उम्र का चौथा पहर, अब बुढ़ापा आ गया,
फिर से बच्चा बना, बुढ़ापा मुझे भा गया।
बच्चों संग बच्चा बना, तोतली बातें करूँ,
बैठकर किस्से सुनाना, बुढ़ापा छा गया।
— डॉ अ कीर्ति वर्द्धन
