गज़ल
आपने उसे शहर में ढूंढा ही नहीं
फिर कहते हो कि वो मिला ही नहीं
ख़ूब खाकर भी लेते नहीं है डकार
जबकि आपके लिए कुछ बचा ही नही
चाहिये था जिसके खिलाफ़ शोर
वहाॅं पर तो ज़रा भी शोर मचा ही नहीं
आपके बीच बैठा है आपका चोर
मगर आपको तो उसका पता ही नहीं
कहते है ख़ूब आग लगी है वहाॅं पर
परन्तु धुंआ उस जगह पर उठा ही नहीं
दुकानदार हुआ परेशान ग्राहक से
कोई भी माल प्रसन्द आया ही नहीं
चाहे कितने ही अपराध करें यहाॅं
मगर क़ानून में इसकी सजा ही नहीं
मारे कितने ही पत्थर रमेश को तुम
ठीक से उस पर निशाना लगा ही नहीं
— रमेश मनोहरा
