कहानी

रूख़सार का चेहरा

खंडवा कॉलेज की सर्द शामों की यादें
खंडवा के उस पुराने कॉलेज परिसर की सर्द शामें आज भी मेरे दिमाग़ के किसी गहरे कोने में ताज़ा महक रखी हुई हैं, मानो कोई पुरानी शायरी की किताब खुली पड़ी हो। बी.एड. ट्रेनिंग का वो सुनहरा दौर था, जब ज़िंदगी एक खुली किताब-ए-हस्ती की तरह मुनव्वर और रहस्यमयी लगती थी। कॉलेज का वो विशाल हॉल, जहाँ चॉक की खटखट और छात्रों की हल्की-फुल्की हँसी हमेशा गूँजती रहती, और बाहर विशाल बरगद के पेड़ों की छाँव तले स्कूल के मासूम बच्चे बेफिक्र होकर खेलते नज़र आते। मुझे आज भी याद है, जब क्लास लेने आता, तो कॉलेज के खुले आँगन में सूरज की नारंगी-लाल लालिमा दीवारों पर बिखर जाती,वो दृश्य किसी नई प्रेम कहानी की शुरुआत जैसा था, जहाँ हवा में भी एक अनकही बेचैनी घुली रहती।
क्लासरूम के गहरे सन्नाटे में जब मेरी उँगलियाँ स्लेट बोर्ड पर चॉक थामे चलतीं, और शब्द धीरे-धीरे उभरने लगते, तो कुछ अजीब- सा महसूस होता कि कोई बड़ी एकाग्रता से मुझे निहार रहा है। वो नाज़िया थी,पिछली बेंच पर बैठी वो लड़की मेरी लिखावट को नहीं, बल्कि चॉक पकड़े मेरे हाथों की हर लयबद्ध हरकत को अपनी चमकती आँखों से टटोलती रहती। उसकी नज़रों में वो जिज्ञासा झलकती जो कॉलेज की दहलीज़ पर पहली बार कदम रखने वाले हर युवा के दिल में होती है,जहाँ किताबों की दुनिया से बाहर भावनाओं का धरातल खुलने लगता है, और हर नज़र में एक अनकही कहानी बसने लगती है।
सादगी और खूबसूरती का अनोखा संगम सा लगता,
एक रोज़ लेक्चर खत्म होते ही नाज़िया संकोच भरी चाल से मेरे पास आई। उसकी शख़्सियत में एक जादुई आकर्षण था,लंबी सुराहीदार गर्दन, हिरनी जैसी चंचल और चमकदार आँखें, और चेहरे पर वो भोलापन जो कॉलेज लाइब्रेरी में रखी पुरानी शायरी की किताबों की ताज़ा महक जैसा लगता। हल्के नीले दुपट्टे में लिपटी वो इतनी सादी लग रही थी कि लगता, प्रकृति ने खुद उसे तराशा हो।
उसने झिझकते हुए एक बड़ा मासूम सवाल किया मुझसे, “सर! क्या आप अपनी आँखों में काजल लगाते हैं? ये इतनी गहरी और काली कैसे हैं?”
उसकी इस बच्चों जैसी सादगी पर मेरी हँसी छूट गई। मैंने मुस्कुराते हुए तसल्ली दी कि ये किसी बनावटी काजल का कमाल नहीं, बल्कि ख़ुदा की क़ुदरती नेमत है। पूरी क्लास खिलखिला उठी। उस पल मुझे लगा ये सिर्फ़ एक मासूम मज़ाक है। लेकिन उस हँसी के शोर में मुझे जरा भी अंदाज़ा न था कि मेरी ये आँखें, जिन्हें मैं महज तोहफ़ा समझता था, किसी के दिल पर गहरी अमिट छाप छोड़ चुकी हैं,किसी ने इन्हीं में अपना सुकून ढूँढ लिया, और अपनी रातों की नींद व दिन का चैन मुझे सौंप दिया।
वक़्त की रफ़्तार और रुख़सार का सिलसिला
वक़्त अपनी रफ्तार से गुज़रता रहा। ट्रेनिंग के दिनों में मेरे साथ ही बी.एड.ट्रेनिंग करने वाली रुख़सार धीरे-धीरे करीब आ गई। बातों का सिलसिला बढ़ा, लेकिन उसकी असली शख़्सियत तब खुली जब उसने ख़त देने शुरू किए। वो ख़त किसी महँगी स्टेशनरी पर नहीं, बल्कि स्कूल क्लासरूम के साधारण नोटबुक के फटे पन्नों पर लिखे जाते। लेकिन उन मामूली पन्नों पर स्याही से बुने जज़्बात किसी सैलाब से कम न थे,रुख़सार ने अपना पूरा दिल उंडेल दिया था।
उनमें से एक ख़त की पंक्तियाँ आज भी दिल पर पत्थर की लकीरें बनकर उतरी हुई हैं।
“आप अपनी आँखों की बात करते हैं, पर क्या जानते कि जब आप ब्लैकबोर्ड की तरफ़ पीठ करके खड़े होते हैं, तो आपकी ख़ामोशी भी मुझसे लंबी-लंबी बातें करती है? ये काग़ज़ का टुकड़ा शायद कल रद्दी बन जाए, लेकिन इन पर लिखे मेरे जज़्बात कभी पुराने न होंगे। खुदा गवाह है, आपकी एक मुस्कुराहट के लिए मैं अपनी पूरी क़ायनात वार सकती हूँ।”
दो दिलों के बीच फँसी अनकही राहें ,आगे बढ़ने लगी मंजिल की तलाश में,
उस ख़त को पढ़ते ही मेरे ज़हन में एक साथ दो चेहरे उभर आए। एक तरफ़ नाज़िया,ख़ामोश आँखों वाली वो मासूम कशिश, जिसने कभी ज़ुबान न खोली लेकिन आँखों से सब कुछ कह दिया। दूसरी तरफ़ रुख़सार,जिसके पास शब्दों की ताक़त थी, और जिसने नोटबुक के पन्नों को हमारे बीच एक मज़बूत पुल बना दिया।
मैं अक्सर सोचता, इंसान का दिल कितना अजीब है। एक तरफ़ वो ‘काजल’ वाला बचकाना सवाल जो आज भी मुझे मुस्कुराने पर मज़बूर कर देता, दूसरी तरफ़ रुख़सार की गहरी बातें जो रूह को बेचैन कर देतीं। ट्रेनिंग खत्म होने की कगार पर पहुँच चुकी थी, खतों का सिलसिला और गहरा होता जा रहा। वो पन्ने अब दराज़ का हिस्सा नहीं, यादों का ख़ज़ाना बन चुके थे। सवाल ये था,क्या मैं उन जज़्बात का जवाब देने को तैयार था? या मेरी आँखें अभी भी क्लास की पिछली बेंच पर नाज़िया की उसी जिज्ञासा को तलाश रही थीं?
रुख़सार का वो आख़िरी खत हाथ में छुपाए कॉलेज की सीढ़ियों से उतरते हुए लगा जैसे पीछे कोई अपना छूट रहा हो। खत कुछ यूँ था,
“तुम्हें इक बात कहनी थी, इजाज़त हो तो कह दूँ मैं…
ये भीगा भीगा सा मौसम, ये तितली फूल और शबनम,
चमकते चाँद की बातें, ये बूंदें और बरसातें,
ये काली रात का आँचल, हवा में नाचते बादल,
धड़कते मौसमों का दिल, महकती ख़ुशबुओं का दिल…
ये सब जितने नज़ारे हैं, कहो किस के इशारे हैं?
सभी बातें सुनी तुमने, फिर आँखें फेर लीं तुमने…
मैं तब जा कर कहीं समझा, कि तुमने कुछ नहीं समझा…
मैं क़िस्सा मुख़्तसर कर के, ज़रा नीची नज़र कर के,
ये कहता हूँ अभी तुमसे—मोहब्बत हो गई तुमसे…”
इन लफ़्ज़ों की नज़ाकत ने मेरे दिल की ज़मीन हिला दी। कॉलेज लाइब्रेरी में वक़्त गुज़ारते, स्कूल बच्चों को पढ़ाते हुए, इन्हीं के इश्क़ में गिरफ़्तार होकर मैंने रुख़सार को अपनी शरीक-ए-हयात बना लिया। शादी के बाद भी वो पुराने क्लासरूम, चॉक की धूल और बाहर खेलते बच्चे,सब यादों में ताज़ा बने रहे।
बरसों बाद खंडवा के उसी कॉलेज के पास चाय की दुकान पर बैठा था। अचानक नाज़िया सामने आ खड़ी हुई। उसने अपनी स्कूटी रोकी , और मेरे करीब आगई,उसने बताया कि अब उसी खंडवा के सरकारी स्कूल में टीचर है, छोटे-छोटे बच्चों को उर्दू और हिंदी सिखाती। हम पास के कैफ़े में बैठे, उसने ज़र्द पड़ चुके खतों की जेरोक्स कॉपियाँ मेज़ पर रख दीं। निवारण रह गया ये सब क्या है?
“सर! ये तहरीरें मेरी थीं,” उसने सिसकते हुए कहा, आँखों में वही पुरानी चमक लिये। “मैं अपनी दीवानगी रुख़सार दीदी को लिखकर देती थी कि वे आप तक पहुँचा दें। मुझे क्या मालूम था कि वे मेरी रूह की आवाज़ को अपना नाम दे देंगी। स्कूल क्लासरूम में उन पलों को याद कर ये नज़्में लिखीं, सोचा था सर के दिल को छू लेंगी।”
मैं सन्न रह गया। ये तो वो ही ख़त थे जिसे रुख़सार ने अपना बताया था,ये कैसे हो सकता था, मैने तुरन्त नाज़िया को घर चलने को कहा,उसे घर ले गया। नाज़िया को पता चल गया था कि रुख़सार मेरी पत्नी है,उसके लिखे प्रेमपत्र से सर काफ़ी मुतासिर रहे हैं इसका ज़िक्र किसी अपने साथी से नाजिया सुन चुकी थी , एक बार नाजिया से रूख़सार ने कहा था कि उसे कोई इस तरह के ख़त या शब्द लिखने भी आते हैं, हम घर पहुंच गए थे,रुख़सार ने दरवाज़ा खोला। हमें साथ देखकर उसके चेहरे से घबराहट नुमाया थी, कुछ देर इधर उधर की बातें की हमने फिर सारे ख़त उसके सामने रख दिए। रूख़सार समझ नहीं पा रही थी कि क्या हो रहा है, मैने फिर कहा “रुख़सार! सच बयान करो। क्या ये नज़्में ओर इसकी तहरीरें तुम्हारी क़लम से निकलीं हैं?”
रुख़सार का चेहरा फ़क़ हो गया। दबी आवाज़ में क़बूल किया, , मैं जानती थी तुम शायर हो, रूहानी लफ़्ज़ों से मुहब्बत करते। मेरे पास अपना कुछ न था, सो नाज़िया की दीवानगी उधार ले ली। ये मैने धोखा किया इस नाजिया के साथ असल में तो उसनेची तुमसेवपने प्यार का इजहारकिया था लेकिन मैं क्या कर सकती थी क्योंकि में भी तुमको खोना नहीं चाहती थी, दो मैने नाजिया के खत को अपना खत बना कर तुम्हे देती रही,ओर नाजिया को समझती रही,कॉलेज के दिनों में सोचा न था ये फ़रेब इतना गहरा हो जाएगा।”
नाज़िया के क़दमों तले ज़मीन खिसक गई। उसने रुख़सार का पल्लू पकड़ लिया, आँसू गालों पर बहने लगे। “मैं बरसों इस आस में जली कि मेरी नज़्में सर के दिल को मुतास्सिर कर रही हैं ,शब्दों से मेरी रूह उनसे बात कर रही। मगर मेरी पहचान किसी ने ओढ़ ली! मेरे जज़्बात को अपनी जगह बनाने का ज़रिया बना लिया?”
वो मंज़र दिल दहला देने वाला था। नाज़िया, जो स्कूल के मासूमों को पढ़ाते हुए हर शाम कॉलेज गलियों को याद करती, लफ़्ज़ बुनती,हर शब्द की उम्मीद में कि सर इनके पीछे छिपी आँखों की गहराई समझेंगे। आज नहीं तो कल,रुख़सार ख़ामोश, नज़रों में शर्मिंदगी थी। ख़त मेरे हाथों में भारी पड़ने लगे,नाज़िया की बरसों की इबादत को तिजारत बना दिया गया। अफ़सोस धोखे का नहीं, मासूम दिल की पुकार के शोषण का था। नाज़िया के लफ़्ज़ हवा में गूँज रहे थे,”मेरी इबादत को अपनी तिजारत बना लिया।” कोई धोखेबाज ही ऐसा कर सकता है,मैने तुम्हे भी अपना उस्ताद माना लेकिन तुम उस्तादचोकर भी मुझे जहर पिलाती रही, क्यों किया ऐसा?
आँगन में गहरा मातम छा गया। लगा नाज़िया टूटकर बिखर जाएगी। लेकिन तभी उसने लंबी साँस ली, आँसू पोंछे। वहीं रखे चिराग़ से उन ख़तों को छुआ,काग़ज़ जलने लगे, राख बनकर हवा में उड़ने लगी।किसी निवेशकों है रोका,अब वैसे भी इन खातों का कोई काम बाक़ी नहीं रह गया था।
“सर! आज मैं ख़ुद को इस फ़रेब से आज़ाद करती हूँ।” बिख़रे बाल समेटे, दरवाज़े की ओर चली। क़दमों में अब लचक न थी, बल्कि वक़ार था,स्कूल टीचर का वो फ़ख़्र जो किताबों से ज़्यादा ज़िंदगी सिखाती।
“बाजी ! अपना घर मुबारक रखें। आपने मेरा इश्क़ चुराया, मगर मेरा हुनर आज भी मेरे पास। लौट रही हूं, लेकिन मेरे ये खत तुम्हे सुकून नहीं रातों को जागने पर मजबूर करदेंगे, अब मैं उन मासूम बच्चों को सिखाऊँगी कि अपनी लिखी ज़िंदगी की तहरीर कभी किसी और के हाथों में मत देना।” भरोसा भी करना तो पहले सामने वाले की नीयत को परख लेना,
वह चली गई। बाहर तेज़ बारिश हो रही। हारकर नहीं, फ़तह पाकर निकली। हम अकेले रह गए,रुख़सार अपने पछतावे में, मैं खोखलेपन में। अफ़साना ख़त्म हो गया, लेकिन ज़मीन पर बिखरी राख अभी तक सुलग रही थी।
सर कुछ समझ नहीं पा रहे थे कि क्या हुआ और कैसे वो भी अपने आपको मुजरिम समझ कर ख़ामोश खड़े थे, रूखसार का चेहरा नीचे की तरफ़ जैसे ज़मीन में धंसता जा रहा था,, नाज़िया जा चुकी थी लेकिन नाजिया जो छोड़ गई थी उसको न तो सर समेट सकते थे न रुख़ सार की जसारत थी कि वो कुछ बोल सके। बची हुई राख़ में भी उन दोनों को चिंगारी नज़र आ रही थी।

— डॉ. मुश्ताक़ अहमद शाह सहज़

डॉ. मुश्ताक़ अहमद शाह

पिता का नाम: अशफ़ाक़ अहमद शाह जन्मतिथि: 24 जून जन्मस्थान: ग्राम बलड़ी, तहसील हरसूद, जिला खंडवा, मध्य प्रदेश कर्मभूमि: हरदा, मध्य प्रदेश स्थायी पता: मगरधा, जिला हरदा, पिन 461335 संपर्क: मोबाइल: 9993901625 ईमेल: dr.m.a.shaholo2@gmail.com शैक्षिक योग्यता एवं व्यवसाय शिक्षा,B.N.Y.S.बैचलर ऑफ़ नेचुरोपैथी एंड योगिक साइंस. बी.कॉम, एम.कॉम बी.एड. फार्मासिस्ट आयुर्वेद रत्न, सी.सी.एच. व्यवसाय: फार्मासिस्ट, भाषाई दक्षता एवं रुचियाँ भाषाएँ, हिंदी, उर्दू, अंग्रेज़ी रुचियाँ, गीत, ग़ज़ल एवं सामयिक लेखन अध्ययन एवं ज्ञानार्जन साहित्यिक परिवेश में रहना वालिद (पिता) से प्रेरित होकर ग़ज़ल लेखन पूर्व पद एवं सामाजिक योगदान, पूर्व प्राचार्य, ज्ञानदीप हाई स्कूल, मगरधा पूर्व प्रधान पाठक, उर्दू माध्यमिक शाला, बलड़ी ग्रामीण विकास विस्तार अधिकारी, बलड़ी कम्युनिटी हेल्थ वर्कर, मगरधा साहित्यिक यात्रा लेखन का अनुभव: 30 वर्षों से निरंतर लेखन प्रकाशित रचनाएँ: 2000+ कविताएँ, ग़ज़लें, सामयिक लेख प्रकाशन, निरन्तर, द ग्राम टू डे, दी वूमंस एक्सप्रेस, एजुकेशनल समाचार पत्र (पटना), संस्कार धनी (जबलपुर),जबलपुर दर्पण, सुबह प्रकाश , दैनिक दोपहर,संस्कार न्यूज,नई रोशनी समाचार पत्र,परिवहन विशेष,समाचार पत्र, घटती घटना समाचार पत्र,कोल फील्ड मिरर (पश्चिम बंगाल), अनोख तीर (हरदा), दक्सिन समाचार पत्र, नगसर संवाद, नगर कथा साप्ताहिक (इटारसी) दैनिक भास्कर, नवदुनिया, चौथा संसार, दैनिक जागरण, मंथन (बुरहानपुर), कोरकू देशम (टिमरनी) में स्थायी कॉलम अन्य कई पत्र-पत्रिकाओं में निरंतर रचनाएँ प्रकाशित प्रकाशित पुस्तकें एवं साझा संग्रह साझा संग्रह (प्रमुख), मधुमालती, कोविड, काव्य ज्योति, जहाँ न पहुँचे रवि, दोहा ज्योति, गुलसितां, 21वीं सदी के 11 कवि, काव्य दर्पण, जहाँ न पहुँचे कवि (रवीना प्रकाशन) उर्विल, स्वर्णाभ, अमल तास, गुलमोहर, मेरी क़लम से, मेरी अनुभूति, मेरी अभिव्यक्ति, बेटियां, कोहिनूर, कविता बोलती है, हिंदी हैं हम, क़लम का कमाल, शब्द मेरे, तिरंगा ऊंचा रहे हमारा (मधुशाला प्रकाशन) अल्फ़ाज़ शब्दों का पिटारा, तहरीरें कुछ सुलझी कुछ न अनसुलझी (जील इन फिक्स पब्लिकेशन) व्यक्तिगत ग़ज़ल संग्रह: तुम भुलाये क्यों नहीं जाते तेरी नाराज़गी और मेरी ग़ज़लें तेरा इंतज़ार आज भी है (नवीनतम) पाँच नए ग़ज़ल संग्रह प्रकाशनाधीन सम्मान एवं पुरस्कार साहित्यिक योगदान के लिए अनेक सम्मान एवं पुरस्कार प्राप्त पाठकों का स्नेह, साहित्यिक मंचों से मान्यता मुश्ताक़ अहमद शाह जी का साहित्यिक और सामाजिक योगदान न केवल मध्य प्रदेश, बल्कि पूरे हिंदी-उर्दू साहित्य जगत के लिए गर्व का विषय है। आपकी लेखनी ने समाज को संवेदनशीलता, प्रेम और मानवीय मूल्यों से जोड़ा है। आपके द्वारा रचित ग़ज़लें और कविताएँ आज भी पाठकों के मन को छूती हैं और साहित्य को नई दिशा देती हैं।

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