कविता

डिजिटल हरियाली के बीच

आज फिर
नीले आकाश-से इस आभासी जगत में
हरित स्वप्नों की लहर उठी है—
शब्दों में लिपटी संवेदनाएँ,
चित्रों में सजती करुणा की छाया।

किसी ने
अंगुलियों से अंकुरित कर दिए वन,
किसी ने
सूखी नदियों को कविता में बहा दिया,
पर धरती—
अब भी चुप है,
उसकी प्यास अनकही ही रह गई।

हैशटैगों की हरियाली में
वह मुस्काई भी—
पर जैसे कोई विरहिणी,
जिसकी आँखों में
अश्रु ही संचित हों।

यहाँ शब्दों का उत्सव है,
पर वहाँ—
मिट्टी की गोद में
अभी भी प्रतीक्षा है
एक सच्चे स्पर्श की।

हमने कहा—
“कम करें कागज़, त्यागें प्लास्टिक”,
पर क्या हमने
अपने भीतर के उपभोग को
कभी त्यागा?
धरती माँ—
वह नहीं चाहती शब्दों के दीप,
उसे चाहिए
मन का एक नन्हा संकल्प,
एक मौन, सच्चा परिवर्तन।

वह पुकारती नहीं,
बस प्रतीक्षा करती है—
कि कोई
उसके घावों पर
अपने व्यवहार का मरहम रख दे।

— डॉ. प्रियंका सौरभ

*डॉ. प्रियंका सौरभ

रिसर्च स्कॉलर इन पोलिटिकल साइंस, कवयित्री, स्वतंत्र पत्रकार एवं स्तंभकार, (मो.) 7015375570 (वार्ता+वाट्स एप) facebook - https://www.facebook.com/PriyankaSaurabh20/ twitter- https://twitter.com/pari_saurabh

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