पांच साल बाद धार क्या बनेगा? — सुरक्षा का बीज या सिर्फ एक और सपना
मप्र के धार की पहचान अब केवल उसके प्राचीन वैभव से नहीं, बल्कि एक नए साहसिक संकल्प से जुड़ने जा रही है। 22 अप्रैल 2026 की घोषणा ने इस शांत, ऐतिहासिक नगर को अचानक राष्ट्रीय विमर्श के केंद्र में ला दिया—जब इसे ‘सेफ सिटी प्रोजेक्ट 2026’ के लिए चुना गया। देश के 10 चुनिंदा शहरों में स्थान पाना और मध्य प्रदेश से अकेले प्रतिनिधि के रूप में उभरना इस बात का संकेत है कि धार अब बदलाव की प्रयोगशाला बनने को तैयार है। ₹10 करोड़ का आवंटन और पांच वर्षों की समयसीमा केवल प्रशासनिक आंकड़े नहीं, बल्कि गहरे सामाजिक परिवर्तन की मजबूत नींव हैं। प्राचीन मालवा की राजधानी अब महिलाओं की सुरक्षा के आधुनिक प्रतीक की ओर बढ़ रही है—एक ऐसा रूपांतरण, जो शहर का चेहरा ही नहीं, उसकी सोच भी बदल सकता है।
यह योजना सिर्फ सुरक्षा के इंतज़ाम खड़े करने की नहीं, बल्कि हर महिला के भीतर भरोसे का अहसास जगाने की पहल है। इसके तहत संवेदनशील इलाकों में सीसीटीवी कैमरे, बेहतर स्मार्ट स्ट्रीट लाइटिंग और सशक्त निगरानी तंत्र विकसित किया जाएगा। महिला हेल्प डेस्क, त्वरित पुलिस प्रतिक्रिया और सुरक्षित सार्वजनिक परिवहन इस ढांचे को और प्रभावी बनाएंगे। ‘पिंक टॉयलेट्स’ जैसी सुविधाएं स्पष्ट करती हैं कि लक्ष्य केवल सुरक्षा नहीं, बल्कि सम्मान और सुविधा भी है। निर्भया फंड से जुड़ी इस पहल को धार लोकसभा क्षेत्र की सांसद और केंद्रीय महिला एवं बाल विकास राज्य मंत्री सावित्री ठाकुर के सक्रिय प्रयासों से गति मिली, जबकि जिला प्रशासन ने चरणबद्ध योजना में हाई-रिस्क क्षेत्रों को प्राथमिकता देकर इसे जमीनी जरूरतों से जोड़ दिया है।
धार की मौजूदा तस्वीर ही इस पहल की अपरिहार्यता को रेखांकित करती है। ग्रामीण और शहरी जीवन का संगम जहां इसकी पहचान है, वहीं यही मिश्रण सुरक्षा की चुनौतियों को और पेचीदा बना देता है। अंधेरी गलियां, कमजोर रोशनी वाले बाजार और सूने सार्वजनिक स्थल—ये परिस्थितियां महिलाओं के लिए असहजता और असुरक्षा का माहौल गढ़ती हैं। कामकाजी महिलाएं, छात्राएं और पर्यटक अक्सर भय के साये में गुजरते हैं। ऐसे में यह परियोजना केवल ढांचे का सुधार नहीं, बल्कि भरोसे को फिर से मजबूत करने का प्रयास है। स्थानीय महिलाओं की आवाज इसे दिशा देती है—“अब हमारी बेटियां बिना डरे बाहर निकल सकेंगी।” यह सिर्फ उम्मीद नहीं, बल्कि लौटते सामाजिक आत्मविश्वास का सशक्त संकेत है।
यह पहल बदलाव का निर्णायक मोड़ बन सकती है, जिसका असर शहर के हर कोने में दिखेगा। महिलाओं की बढ़ती सुरक्षा के साथ उनकी भागीदारी शिक्षा, रोजगार और उद्यमिता में तेज़ी से बढ़ेगी। बाजार देर तक जीवंत रहेंगे, छोटे कारोबारों को संबल मिलेगा और निवेश का भरोसा मजबूत होगा। पर्यटन को भी नई रफ्तार मिलेगी, क्योंकि धार के ऐतिहासिक स्थल अब अधिक सुरक्षित और आकर्षक बनेंगे। इससे स्थानीय गाइड, हस्तशिल्प विक्रेता, होटल व्यवसायी और परिवहन सेवाएं सीधे लाभान्वित होंगी, और शहर की अर्थव्यवस्था में नई ऊर्जा आएगी। मध्य प्रदेश सरकार इसे एक मॉडल मान रही है, जो इंदौर, भोपाल सहित अन्य शहरों के लिए भी मार्गदर्शक बन सकता है। राष्ट्रीय स्तर पर यह पहल इस धारणा को तोड़ती है कि ‘सेफ सिटी’ केवल महानगरों तक सीमित है।
इस चमकती तस्वीर के पीछे कुछ सख्त सच भी छिपे हैं, जिन्हें नजरअंदाज करना भारी पड़ सकता है। 2012-16 के दौरान मध्य प्रदेश के चार शहरों में लागू ‘सेफ सिटी इनिशिएटिव’ की रिपोर्ट स्पष्ट करती है कि केवल बुनियादी ढांचे के सुधार से अपराध में अपेक्षित कमी नहीं आई। सामाजिक मान्यताओं और व्यवहार में बदलाव की कमी ने इसकी प्रभावशीलता सीमित कर दी। यही अनुभव इस नई परियोजना के लिए एक अहम चेतावनी है। कैमरे और रोशनी सुरक्षा के साधन हैं, समाधान नहीं—असल परिवर्तन समाज की सोच में आता है। इसलिए व्यवहार परिवर्तन, लैंगिक संवेदनशीलता और जन-जागरूकता अभियानों को अनिवार्य रूप से जोड़ना होगा, ताकि सुरक्षा दिखावे से आगे बढ़कर जीवन की स्वाभाविक सच्चाई बन सके।
जमीन पर उतरते ही असली परीक्षा शुरू होती है, और यहीं चुनौतियां सामने आती हैं। ₹10 करोड़ का फंड तभी असर दिखाएगा, जब उसका पारदर्शी और सुविचारित उपयोग हो। तकनीकी उपकरणों का नियमित रखरखाव, कर्मचारियों का समुचित प्रशिक्षण और निगरानी तंत्र की सतत सक्रियता—यही इसकी सफलता की धुरी हैं। सीसीटीवी के विस्तार के साथ गोपनीयता का सवाल भी उठेगा, जिसे संतुलित और संवेदनशील तरीके से संभालना होगा। साथ ही डिजिटल साक्षरता और तकनीकी जागरूकता बढ़ाना जरूरी है, ताकि नागरिक इस व्यवस्था से जुड़ सकें और उसका सही उपयोग करें। पांच वर्षों के बाद इसकी निरंतरता बनाए रखना भी चुनौती होगी, क्योंकि योजनाएं तभी सफल मानी जाती हैं जब वे समय के साथ जीवित और प्रासंगिक बनी रहें।
फिर भी, यह पहल एक साझा जिम्मेदारी का दुर्लभ अवसर बनकर उभरती है। प्रशासन, पुलिस, गैर-सरकारी संगठन और नागरिक—सभी को मिलकर इस बदलाव को जमीन पर उतारना होगा। सांसद सावित्री ठाकुर के नेतृत्व में बनी रूपरेखा में इस साझेदारी की स्पष्ट झलक है। यदि स्कूलों, कॉलेजों, महिला समूहों और स्थानीय संगठनों को सक्रिय रूप से जोड़ा गया, तो यह पहल केवल योजना नहीं, बल्कि एक व्यापक सामाजिक आंदोलन बन सकती है—जो सुरक्षा से आगे बढ़कर समाज के हर आयाम को छुएगी। यही सामूहिक प्रयास इसे स्थायित्व और वास्तविक गहराई दे सकता है।
इतिहास के मोड़ पर खड़ा धार अब ऐसे बदलाव की ओर बढ़ रहा है, जो सिर्फ रूप नहीं, सोच भी बदलेगा। सवाल केवल चेहरे के परिवर्तन का नहीं, बल्कि उसकी गहराई और स्थायित्व का है। इस यात्रा में आशा और सतर्कता दोनों जरूरी हैं। मजबूत वित्तीय आधार, केंद्र-राज्य सहयोग और पांच वर्षों की समयसीमा इसे सफलता की मजबूत नींव देते हैं। यदि क्रियान्वयन पारदर्शी रहा, जनभागीदारी मजबूत हुई और सोच में बदलाव आया, तो धार की सड़कें रोशनी के साथ भरोसे और स्वतंत्रता से चमकेंगी। तब यह शहर संदेश देगा कि सुरक्षा कोई विशेषाधिकार नहीं, बल्कि हर नागरिक का अधिकार है—और इसी में विकास का असली अर्थ छिपा है।
— प्रो. आरके जैन “अरिजीत”
