कविता

मुड़ता कलम का रुख

परेशां अरमानों का रुख मोड़ दिया,
कलम का वो निर्भीक दौर ही छोड़ दिया,
सच की स्याही अब बोझिल लगने लगी,
इसलिए झूठ का सहारा थाम लिया।

झूठ लिखो तो वाह-वाह के फूल खिलें,
सच लिखो तो शब्दों के कंठ ही सिलें,
इतना भारी हो गया है झूठ का ताज,
सच दम तोड़े, नीचे गिरते ही मिलें।

हाथी अब हवा में उड़ने लगे हैं,
बाज़ों के पर भी झुकने लगे हैं,
थूकों से लड्डू बंधने लगे जहां,
वहां सच के दीप भी बुझने लगे हैं।

झांसे की चादर में लिपटी हकीकत,
विज्ञापन ही बन बैठा है अब इबादत,
जीवन की राहों में भ्रम का ये जाल,
सपनों को सच मान खोती है चाहत।

चांद को धरती पे लाने की बातें,
हर आका करता है मीठी सौगातें,
पर इन मीठी बातों के नीचे दबकर,
सांसें भी पूछें—कहाँ हैं हकीकतें?

जैसे-तैसे पटरी पर आती जो जिंदगी,
ऐलानों की आंधी में डगमगाती बंदगी,
अब हर घोषणा में डर का ही रंग है,
सच की जुबां भी हो गई है बंदगी।

— राजेन्द्र लाहिरी

राजेन्द्र लाहिरी

पामगढ़, जिला जांजगीर चाम्पा, छ. ग.495554

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