कहानी

समाज की बेजान रस्में

शहला की ज़िंदगी उस सूखी झील की मानिंद हो गई थी जिसके वीरान किनारों पर अब परिंदे भी चहकना भूल गए थे। महज़ अट्ठाइस साल की उम्र में ज़ुबैर के चले जाने के बाद, उसके हिस्से में सिर्फ़ सफ़ेद रंग की उदासी, घर की चारदीवारी की घुटन और यादों का एक ला-इन्तेहा सिलसिला आया था। जवानी की दहलीज़ पर बेवा हो जाने का सोग क्या होता है, यह उसे उन हमदर्द निगाहों से पता चलता जो उसे किसी ‘बेचारी’ की तरफ़ देखते हुए महज़ तरस खाती थीं। लोग उसे दिलासा देते, मगर उन दिलासों में मुस्तक़बिल का कोई रंग न था।
कॉलेज के दिनों में वह फूलों की तरह खिलखिलाती थी, उसकी हंसी की खनक लाइब्रेरी की ख़ामोशियों में भी रूह फूँक देती थी, मगर अब वह मुस्कुराहट माज़ी के किसी गर्द-आलूद संदूक में हमेशा के लिए दफ़न हो चुकी थी। अब दिन और रात के बीच का फ़र्क़ मिट चुका था। सुबह की ताज़ा हवा उसे सहलाने के बजाय उसके ज़ख्मों को कुरेदती महसूस होती। घर का वह कोना, जहाँ कभी ज़ुबैर के साथ बैठकर भविष्य के सुनहरे सपने बुने गए थे, अब एक गहरी खाई जैसा लगता, जिसमें गिरते हुए शहला को हर रोज़ अपनी रूह लहूलुहान होती महसूस होती।
समाज की बेजान रस्मों ने उसके चारों ओर एक अदृश्य घेरा खींच दिया था। जिन रंगीन कपड़ों और महकते अतर से उसे कभी लगाव था, अब वे अलमारी के किसी अंधेरे कोने में पड़े अपनी बारी का इंतज़ार कर रहे थे, यह जानते हुए भी कि वह बारी अब कभी नहीं आएगी। लोग आते, दुःख बाँटने के बहाने बैठते और चलते-चलते उसे यह एहसास दिला जाते कि अब वह एक ‘अधूरी’ औरत है। उन दिलासों में अक्सर एक अजीब सी ठंडक होती थी, जो सहानुभूति कम और पाबंदी का एहसास ज़्यादा दिलाती थी।
शहला की तन्हाई सिर्फ़ ज़ुबैर की कमी नहीं थी, बल्कि अपनी पहचान खो देने का मातम भी था। वह चाँद जो कभी उसकी रातों को रौशन करता था, अब बादलों के पीछे ऐसा छुपा कि उजाला भी बोझ लगने लगा। वह अक्सर घंटों खिड़की के पास बैठी खाली सड़कों को निहारती रहती, जैसे इंतज़ार कर रही हो कि कोई हवा का झोंका ज़ुबैर की आवाज़ या उसकी हंसी का कोई टुकड़ा वापस ले आएगा। मगर हक़ीक़त की चट्टान से टकराकर उसके सारे ख़याल पाश-पाश हो जाते। उसे अब एहसास हो चला था कि दुनिया का सबसे मुश्किल काम ज़िंदा रहते हुए मुर्दा बनकर गुज़ारना है।बाज़ार की उस तपती दोपहर में जब वक़्त की रफ़्तार जैसे थम सी गई थी, शहला अपनी ही उलझनों में गुम भीड़ का हिस्सा बनी हुई थी। धूल, शोर और इंसानी चेहरों के उस समंदर में अचानक उसकी नज़रें एक चेहरे पर ठहर गईं। वह चेहरा, जिसे उसने यादों के किसी बंद संदूक में बरसों पहले क़ैद कर दिया था,आदिल,
वक़्त की बेरहम गर्द (धूल) ने नक्श ज़रूर बदल दिए थे, लेकिन रूह की पहचान आज भी वैसी ही थी। आदिल, जो कभी कॉलेज के गलियारों में उसका साया बनकर चलता था। वह जो उसकी ख़ामोशियों को भी पढ़ लेता था, आज ख़ुद एक अनकही दास्तान की तरह उसके सामने खड़ा था। उस दौर में समाज की दीवारें और मजबूरियों की ज़ंजीरें इतनी सख़्त थीं कि दोनों ने बिना कुछ कहे एक-दूसरे से किनारा कर लिया था।
रूह का बिख़राव और आदिल की टीस
जब आदिल की नज़र शहला पर पड़ी, तो उसे अपनी आँखों पर यक़ीन नहीं आया। कहाँ वह चंचल, ज़िंदादिल शहला और कहाँ सफ़ेद लिबास में लिपटी, वीरानी ओढ़े यह गुमसुम सी औरत। शहला के चेहरे की ज़र्द रंगत और आँखों के नीचे पड़े काले घेरे उसकी बेवा होने की नहीं, बल्कि उसके अंदर मरती हुई उम्मीदों की गवाही दे रहे थे।
आदिल के दिल में एक कसक उठी। वह शहला की ज़ात के इस बिख़राव को देखकर अंदर तक दहल गया। उस दिन की वह छोटी सी मुलाक़ात, जिसमें शब्दों से ज़्यादा सिसकियों का दख़ल था, शहला के भीतर जमे हुए बर्फ़ जैसे अहसासों को पिघला गई।
आदिल ने आहिस्ता-आहिस्ता शहला की वीरान ज़िंदगी के बंद दरवाज़ों पर दस्तक देना शुरू किया। शुरूआती दिनों में वह सिर्फ़ एक पुराने दोस्त की हैसियत से आता था। उसके आने का बहाना कभी उसकी बीमारी की दवाइयाँ होतीं, तो कभी घर की टपकती छत को दुरुस्त करवाने की फ़िक्र।या कोई खास जरूरत के वक़्त,
आस-पड़ोस और ज़माने की नज़रों में आदिल महज़ एक नेक इंसान था, जो एक बेसहारा की मदद कर रहा था। लेकिन शहला का दिल हक़ीक़त जानता था। आदिल की मौजूदगी उसके लिए उस ताज़ी हवा की मानिंद थी, जो घुटते हुए कमरे में वेंटिलेटर से आती है।
शहला को एक नई पहचान की तलाश थी,एक कश्मकश थी,उसके अंदर,
शहला अक्सर आईने के सामने खड़ी होकर ख़ुद से सवाल करती थी,क्या एक बेवा को दोबारा मुस्कुराने का हक़ है? क्या समाज की रस्मों से ऊपर उठकर मैं फ़िर से अपनी ज़िंदगी की बागडोर थाम सकती हूँ?आदिल की सबसे बड़ी ख़ूबी यह थी कि उसने कभी शहला को बेचारी’ या ‘मजबूर’नहीं समझा। वह उसे उसी पुरानी शहला की तरह देखता था, जिसकी अपनी एक राय थी, अपनी पसंद-नापसंद थी। उसने शहला को यह अहसास दिलाया कि उसकी शख़्सियत किसी के नाम के मिट जाने से ख़त्म नहीं हुई है।
धीरे-धीरे, आदिल की सादगी और बिना किसी स्वार्थ की उस मुहब्बत ने शहला के अंदर जीने की एक नई लौ जला दी। अब वह बाज़ार की भीड़ में खो जाने वाली औरत नहीं, बल्कि अपने अस्तित्व को फ़िर से तलाशने वाली एक मज़बूत शख़्सियत बनने की राह पर थी।
आदिल, जो अब तक अपनी उलझनों और समाज के डर से लड़ रहा था, शहला के खुले इज़हार ने उसे अंदर तक झकझोर दिया। उसे एहसास हुआ कि उसकी ख़ामोशी ने शहला के जख्मों पर मरहम लगाने के बजाय उन्हें और कुरेद दिया था।
्अगली शाम, सूरज ढलने की तैयारी में था और आसमान की लाली शहला के घर के सूने आंगन में उतर रही थी। शहला खिड़की के पास बैठी शून्य में ताक रही थी, जब दरवाजे पर एक जानी-पहचानी दस्तक हुई। दिल की धड़कनें तेज हो गईं, लेकिन वह अपनी जगह से हिली नहीं।आदिल कमरे में दाखिल हुआ। उसने कुछ नहीं कहा, ठीक वैसा ही किया जैसा शहला ने माँगा था। वह उसके सामने वाली कुर्सी पर बैठ गया। न कोई सफ़ाई, न कोई दिलासा। कमरे में सिर्फ़ दो सांसों की आवाज़ थी और एक अनकहा बोझ।
शहला ने नजरें उठाईं। उसने आदिल की आँखों में वह ‘रहम’ तलाशने की कोशिश की जिससे उसे डर लगता था, लेकिन वहां कुछ और ही था,एक गहरा पश्चाताप और शायद उससे भी गहरी कोई भावना।
काफी देर बाद आदिल ने चुप्पी तोड़ी, उसकी आवाज़ भारी थी।
“शहला, ये दिन तुम्हारे लिए जितने लंबे थे, मेरे लिए उससे कहीं ज्यादा भारी थे। मैं रहम नहीं कर रहा था, मैं ख़ुद को इस क़ाबिल बना रहा था कि तुम्हारे सामने एक हमदर्द बनकर नहीं, बल्कि एक साथी बनकर खड़ा हो सकूँ। दुनिया की बातें काँटों की तरह चुभती हैं, लेकिन तुम्हारी खामोशी मुझे मार रही थी।”
उसने मेज पर रखे शहला के ठंडे पड़ चुके हाथ पर अपना हाथ रखा। यह पहली बार था जब उसने शहला को उस ‘मजबूर औरत’ के दायरे से बाहर देखा था।
शहला की आँखों से फ़िर आँसू गिरे, लेकिन इस बार उनमें कड़वाहट नहीं थी। उसने महसूस किया कि आदिल का न आना उसकी बेरुख़ी नहीं, बल्कि उसकी अपनी कशमकश थी। वह समाज की बेड़ियों को तोड़ने की हिम्मत जुटा रहा था।उस शाम के बाद, शहला ने काली चादर के पीछे छिपना छोड़ दिया।
आदिल अब रोज आता था, लेकिन अब वह उसकी ज़रूरतों का सामान नहीं, बल्कि उसके चेहरे की मुस्कुराहट की वजह लेकर आता था।
उन्होंने तय किया कि वे दुनिया की नज़रों में जो ‘अधूरे’ हैं, एक-दूसरे के साथ मिलकर ‘पूरे’ होंगे।
शहला को अब अपनी पहचान किसी के रहम में नहीं, बल्कि आदिल की उन आँखों में दिखने लगी थी, जो उसे एक ‘बेवा’ नहीं, बल्कि सिर्फ शहला मानती थीं। वह समझ गई थी कि मोहब्बत रहम की मोहताज नहीं होती, उसे बस एक ख़ामोश साथ और सच्चे यक़ीन की ज़रूरत होती है।
शहला का खिड़की के पास खड़ा होना महज़ एक क्रिया नहीं, बल्कि अतीत और वर्तमान के बीच की एक धुंधली दहलीज़ थी। बाहर गहराता अंधेरा उसके जीवन के उस ख़ाली पन का अक्स था जो ज़ुबैर के जाने के बाद पैदा हुआ था। एक गज़ल जो उसके ज़हन में गूँज रही थी, वह सिर्फ़ शब्द नहीं बल्कि उसके बीते हुए कल का शोक-गीत थी।
वह लोग भी बिछड़े, जो बिछड़ने के नहीं थे,
यह पंक्ति शहला के उस अविश्वास को दर्शाती है कि मौत इतनी बेरहम भी हो सकती है। ज़ुबैर उसके लिए सिर्फ़ एक शौहर नहीं, उसकी पहचान का मरकज़ था।
आदिल का पुनः आगमन होता है,हमदर्दी से मोहब्बत तक
कहानी का सबसे मज़बूत मोड़ तब आता है जब आदिल अपनी भूमिका बदलता है। अब तक वह एक सहारा था, शायद एक डॉक्टर या एक पुराना दोस्त, जो दवाइयाँ लाता था। लेकिन उस शाम वह अपनी तमाम सामाजिक और पेशेवर चादरें उतारकर आया था।
आदिल का यह कहना कि हमदर्दी की एक मियाद होती है,समाज के उस चेहरे पर तमाचा है जो विधवाओं को सिर्फ़ ‘बेचारी’ समझकर उन पर दया करता है। आदिल ने उसे ‘बेचारी’ नहीं, अपनी ‘मोहब्बत’ के रूप में स्वीकार किया।बरसों बाद चेहरे पर मुस्कान हंसी बेफ़िक्री इस बात का प्रतीक है कि शहला ने खुद को फ़िर से एक स्त्री के रूप में देखना शुरू किया, न कि सिर्फ़ एक गमज़दा साये के रूप में।शहला को सफ़ेद चादर उतारकर आसमानी रंग का जोड़ा पहनना है,
सफ़ेद रंग,मातम, ठहराव और दुनिया से दूरी का प्रतीक था।आसमानी रंग, खुला आसमान, उम्मीद और नई उड़ान का प्रतीक बना।
जब उसने आदिल के कंधे पर सिर रखा, तो वह सिर्फ़ एक शारीरिक सहारा नहीं था, बल्कि वह उस बोझ का उतरना था जो वह बरसों से अकेले ढो रही थी। समाज अक्सर औरत की पहचान उसके मर्द से तय करता है,पहले बेटी, फिर बीवी, और फिर बेवा। लेकिन आदिल के साथ ने उसे उसकी स्वयं की पहचान वापस दी।
वह झील जो सूखी थी, वह अब ‘वफ़ा’ के पानी से भर चुकी थी। प्यार सिर्फ़ हासिल करना नहीं है, बल्कि किसी के सूखे हुए जीवन में फ़िर से हरियाली लाना है।
ज़ख्म चाहे कितने ही गहरे क्यों न हों, अगर मरहम ‘आदिल’ जैसी सच्ची मोहब्बत का हो, तो इंसान फिर से मुस्कुराना सीख जाता है।

— डॉ. मुश्ताक़ अहमद शाह सहज़

डॉ. मुश्ताक़ अहमद शाह

पिता का नाम: अशफ़ाक़ अहमद शाह जन्मतिथि: 24 जून जन्मस्थान: ग्राम बलड़ी, तहसील हरसूद, जिला खंडवा, मध्य प्रदेश कर्मभूमि: हरदा, मध्य प्रदेश स्थायी पता: मगरधा, जिला हरदा, पिन 461335 संपर्क: मोबाइल: 9993901625 ईमेल: dr.m.a.shaholo2@gmail.com शैक्षिक योग्यता एवं व्यवसाय शिक्षा,B.N.Y.S.बैचलर ऑफ़ नेचुरोपैथी एंड योगिक साइंस. बी.कॉम, एम.कॉम बी.एड. फार्मासिस्ट आयुर्वेद रत्न, सी.सी.एच. व्यवसाय: फार्मासिस्ट, भाषाई दक्षता एवं रुचियाँ भाषाएँ, हिंदी, उर्दू, अंग्रेज़ी रुचियाँ, गीत, ग़ज़ल एवं सामयिक लेखन अध्ययन एवं ज्ञानार्जन साहित्यिक परिवेश में रहना वालिद (पिता) से प्रेरित होकर ग़ज़ल लेखन पूर्व पद एवं सामाजिक योगदान, पूर्व प्राचार्य, ज्ञानदीप हाई स्कूल, मगरधा पूर्व प्रधान पाठक, उर्दू माध्यमिक शाला, बलड़ी ग्रामीण विकास विस्तार अधिकारी, बलड़ी कम्युनिटी हेल्थ वर्कर, मगरधा साहित्यिक यात्रा लेखन का अनुभव: 30 वर्षों से निरंतर लेखन प्रकाशित रचनाएँ: 2000+ कविताएँ, ग़ज़लें, सामयिक लेख प्रकाशन, निरन्तर, द ग्राम टू डे, दी वूमंस एक्सप्रेस, एजुकेशनल समाचार पत्र (पटना), संस्कार धनी (जबलपुर),जबलपुर दर्पण, सुबह प्रकाश , दैनिक दोपहर,संस्कार न्यूज,नई रोशनी समाचार पत्र,परिवहन विशेष,समाचार पत्र, घटती घटना समाचार पत्र,कोल फील्ड मिरर (पश्चिम बंगाल), अनोख तीर (हरदा), दक्सिन समाचार पत्र, नगसर संवाद, नगर कथा साप्ताहिक (इटारसी) दैनिक भास्कर, नवदुनिया, चौथा संसार, दैनिक जागरण, मंथन (बुरहानपुर), कोरकू देशम (टिमरनी) में स्थायी कॉलम अन्य कई पत्र-पत्रिकाओं में निरंतर रचनाएँ प्रकाशित प्रकाशित पुस्तकें एवं साझा संग्रह साझा संग्रह (प्रमुख), मधुमालती, कोविड, काव्य ज्योति, जहाँ न पहुँचे रवि, दोहा ज्योति, गुलसितां, 21वीं सदी के 11 कवि, काव्य दर्पण, जहाँ न पहुँचे कवि (रवीना प्रकाशन) उर्विल, स्वर्णाभ, अमल तास, गुलमोहर, मेरी क़लम से, मेरी अनुभूति, मेरी अभिव्यक्ति, बेटियां, कोहिनूर, कविता बोलती है, हिंदी हैं हम, क़लम का कमाल, शब्द मेरे, तिरंगा ऊंचा रहे हमारा (मधुशाला प्रकाशन) अल्फ़ाज़ शब्दों का पिटारा, तहरीरें कुछ सुलझी कुछ न अनसुलझी (जील इन फिक्स पब्लिकेशन) व्यक्तिगत ग़ज़ल संग्रह: तुम भुलाये क्यों नहीं जाते तेरी नाराज़गी और मेरी ग़ज़लें तेरा इंतज़ार आज भी है (नवीनतम) पाँच नए ग़ज़ल संग्रह प्रकाशनाधीन सम्मान एवं पुरस्कार साहित्यिक योगदान के लिए अनेक सम्मान एवं पुरस्कार प्राप्त पाठकों का स्नेह, साहित्यिक मंचों से मान्यता मुश्ताक़ अहमद शाह जी का साहित्यिक और सामाजिक योगदान न केवल मध्य प्रदेश, बल्कि पूरे हिंदी-उर्दू साहित्य जगत के लिए गर्व का विषय है। आपकी लेखनी ने समाज को संवेदनशीलता, प्रेम और मानवीय मूल्यों से जोड़ा है। आपके द्वारा रचित ग़ज़लें और कविताएँ आज भी पाठकों के मन को छूती हैं और साहित्य को नई दिशा देती हैं।

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