हास्य-व्यंग्य – आलोचक की आलोचना
रामस्नेही एक कवि थे। उदारता से भरी रचनायें लिखते थे। उनकी ख्याति देश के कोने-कोने तक हुई। उनकी एक कविता एक आलोचक के हाथ लग गयी। गुणी आलोचक थे। बड़े-बडे लेखकों की आलोचना करके बड़ी उपलब्धि हासिल किये थे।
कुछ लोग उन्हें आलोचना का महामना कहा। आलोचक महोदय भी प्रसिद्धि की सीमा पार कर चूके थे। आलोचक रामस्नेही की कविता की आलोचना लिखी। आलोचना का एक-एक तत्व उड़ेल दिया। उनकी आलोचना का जितना गरल था। सब उनकी कविता पर बहा कर दी।
ईर्ष्या की कुदृष्टि इतनी कूट-कूट कर भरी थी। कविता की आत्मा तक कराह उठी। जब कविता की आत्मा कराह उठे, कवि अपनी कविता की आलोचना सुनकर कवि की रुह कांपने लगे तो समझो आलोचना अपने अंतिम रुप को प्राप्त कर ली है अर्थात आलोचना पूर्णरूपेण सफल रही।
कवि रामस्नेही अपनी कविता की आलोचना सुनकर चारों खाने चित्त हो गये। जिह्वा से शुध्द शब्द नहीं निकल पा रहे थे। उनके आंखों से झर-झर आंसू बह पड़े। इतनी खूबसूरत कविता का ऐसा पोस्टमार्टम आलोचक महोदय ने कर दी। कवि महोदय को मुर्छा आ गयी। बिना संजीवनी के कवि की मुर्झा तारीफ करने वाला आलोचक ही ठीक कर सकता है।
कवि बहुत चिंतित हुआ कि आलोचना ठीक से नहीं की गयी। आलोचक जी लगता है आलोचना के समस्त गुण का गलत मरहम लगा दिये जिससे गलत प्रतिक्रिया हुई। कवि महोदय ने आलोचक के पास पारितोषिक भेजा और कविता पर फिर आलोचना लिखने का निवेदन किया।
कविता पर फिर से आलोचना लिखी गयी। आलोचक जी पारितोषिक पाकर उनका ह्रदय गदगद हो गया। कविता का समस्त अवगुण गुण में परिवर्तित हो गया। तारीफों की ऐसी बारिश की गयी। कवि महोदय ऐसा महसूस किये जैसे संगम में डुबकी लगा लिये और इस भवसागर से पार हो गये।
— जयचन्द प्रजापति ‘जय’
