ऊँचाई पर बने रहने के लिए कुछ ख़ास
बादलों के पार
चुपचाप चलता मन
हवा भी धीमी
पहाड़ों की गोद
सपनों की सीढ़ियाँ
चढ़ती साँसें
धूप का स्पर्श
चट्टानों पर लिखे
धैर्य के शब्द
एकांत की ध्वनि
अंदर ही गूंजे
मौन का गीत
गिरने का भय
फिर भी उठता है
आत्मबल रोज़
क्षितिज के पार
नया सा उजाला
हर सुबह में
थकते कदम भी
रुकना नहीं सीखें
यही संदेश
आसमान गवाह
संग्राम भीतर का
जारी रहता
हर चोट में भी
छिपा एक अवसर
नई उड़ान का
समय की धारा
चुपचाप कहती है
टिके रहो तुम
सफलता नहीं
स्थिरता ही असली
ऊँचाई है
— डॉ. अशोक
