अति प्रिय
नहीं मानते बोद्ध धर्म हम, पर बुद्ध हमें अति प्रिय हैं,
जैन धर्म के नहीं अनुयायी, उनका दर्शन भी प्रिय है।
रविदास को गुरू मानते, भले चर्म कर्म नहीं अपना,
सिक्ख गुरुओं की वाणी, सभी धर्मों का सार प्रिय है।
ईसा मूसा का भी मान, सनातन ने सिखलाया हमको,
नास्तिक आस्तिक सभी प्रिय, शैव वैष्णव भी प्रिय हैं।
हमने तो बस मानवता को, मानव धर्म मानना सीखा,
सभी धर्मों से आगे बढ़कर, राष्ट्र धर्म सबसे प्रिय है।
रसखान रहीम के दोहे हों या, तुलसी सूर की चौपाई,
कबीर की वाणी राह दिखाती, सबको लगती प्रिय है।
रत्नाकर से बन कर वाल्मीकि, रामायण रच डाला,
गुरू वशिष्ठ परशुराम प्रिय, सबरी भी हमको प्रिय है।
करते हैं हम मान सभी का, जो मानवता को मान रहे,
मानवता का दुश्मन कोई हो, नहीं सनातन में प्रिय है।
भ्रष्टाचार में लिप्त रहे जो, क़ानून सजा उनको देगा,
करे देश से ग़द्दारी जो, बस उसकी मौत हमें प्रिय है।
— डॉ अकीर्ति वर्द्धन
