आखिर कौन थी
हंस रहा हूं
या रो रहा हूं,
मगर मन का आंसू आँखो से छलक रहा हैं!
कालेज के दीक्षान्त समारोह पर देखा जो कालेज कभी कदम न रखी वो गोल्ड मेडल गले में पहनकर मन ही मन में नृत्य कर रही थी!
पता चला कि 3 साल में सिर्फ एडमिशन वाले दिन आती हैं,
वो फोटो खिचवाने के लिये
सामने मेधावी छात्रो की टोली छिटक रहे
“अरे यें कौन लड़की जो कालेज कभी न आयी और मेडल पर हाथ साफ कर गई!
तब चपरासी हरिप्रसाद ने हाथ से खैनी बनाते हुये बताया कि
” कोई पहचान नहीं ना वो अपने प्रबंधक के खानदान के बड़े भाई साहब की बिटिया जो कलकत्ता से सिर्फ परीक्षा देने व मेडल लेने आयी है!
अन्य छात्र सिर नीचे झुका लिये जब प्राचार्य जी बोले “कालेज की बिटिया ने नाम रोशन कर दिया!
ऐसा रोशन जिसमें सबका भविष्य अंधेरे में दिखाई दे रहा था,
फिलहाल दिल में क्रांति उमड़ने लगा
“ये सरासर गलत और घटिया राजनीति और परिवारवाद का का प्रमाण जो शिक्षा को गंदगी और कीचड़ युक्त बना दिया हैं,
छात्रो की लगन और उम्मीद पर लगातार पानी फिर रहे है!”
फिलहाल मुस्कुराकर हम लोग और छात्र जोर-जोर से ताली बजाने लगेl
पर्दा गिर गया..
— अभिषेक कुमार शर्मा
