ग़ज़ल
देखकर मंदिर शिवाला सिर झुकाती हूँ मगर
आज ये हालात है कुछ मांग मैं, पाती नहीं
जिस जगह इज्ज़त मिली सजदे किये है हमने भी
जिस गली ने छीन ली मेरी हंसी, जाती नहीं ।
सच है कि सच झूठ के मन को कभी भाता नहीं ।
इसलिए बातें दिलों की लव पे मैं, लाती नहीं ।
जब जवानी में जवाँ अरमान सारे तोड़कर
जा चुकी हैं जो बहारें, लौटकर आती नही ।
जो अमानत है मेरी, मेरी ही है सब जान लें
अपने हक पर हक जताया, गैर की खाती नहीं ।
— साधना सिंह
