गीतिका/ग़ज़ल

ग़ज़ल

देखकर मंदिर शिवाला सिर झुकाती हूँ मगर
आज ये हालात है कुछ मांग मैं, पाती नहीं
जिस जगह इज्ज़त मिली सजदे किये है हमने भी
जिस गली ने छीन ली मेरी हंसी, जाती नहीं ।
सच है कि सच झूठ के मन को कभी भाता नहीं ।
इसलिए बातें दिलों की लव पे मैं, लाती नहीं ।
जब जवानी में जवाँ अरमान सारे तोड़कर
जा चुकी हैं जो बहारें, लौटकर आती नही ।
जो अमानत है मेरी, मेरी ही है सब जान लें
अपने हक पर हक जताया, गैर की खाती नहीं ।

— साधना सिंह

साधना सिंह

मै साधना सिंह, युपी के एक शहर गोरखपुर से हु । लिखने का शौक कॉलेज से ही था । मै किसी भी विधा से अनभिज्ञ हु बस अपने एहसास कागज पर उतार देती हु । कुछ पंक्तियो मे - छंदमुक्त हो या छंदबध मुझे क्या पता ये पंक्तिया बस एहसास है तुम्हारे होने का तुम्हे खोने का कोई एहसास जब जेहन मे संवरता है वही शब्द बन कर कागज पर निखरता है । धन्यवाद :)

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