सामाजिक संस्थाएं चित्र -विचित्र
संस्था हित नहीं झगड़े हैं,
सब के आपस के झगड़े हैं,
यह कोई अफवाह नहीं,
संस्था हित परवाह नहीं,
मूल बात कुछ और होती
दिखाई जाती कुछ और है,
मुख्य मुद्दा भटकाने को,
मचाते केवल शोर है।
कार्यकारिणी में फैसला लेते हैं,
सदन में विरोध दर्ज करते हैं,
मीटिंगों में भड़ास निकालते हैं,
छिपी दबी कुंठाएं उछालते हैं।
मन आया कुछ भी बोलते हैं,
कटुता समाज में घोलते हैं,
जितना ये शोर मचाते हैं,
ज्ञानी निर्भीक कहलाते हैं।
बे बात इस्तीफा देते हैं,
लाइम लाइट चाहते हैं,
स्वयं का हित साधन में,
संस्था अहित कर जाते हैं।
संवैधानिक शपथ तो खाते हैं,
पर, निष्ठा कहीं निभाते हैं,
समयाभाव में इस्तीफा देते हैं,
पर, फिर पद पर आ जाते हैं।
जो खुद्दारी में चलते हैं,
निशाने पर ही रहते हैं,
संस्था हित जो चाहते हैं,
वो ही दबाए जाते हैं।
जब पद जैसा कद नहीं,
क्यों कद जैसा पद नहीं?
कद से ज्यादा नाम की लिप्सा,
नाम से ज्यादा पद की लिप्सा।
नहीं किसी को इससे जुगुप्सा,
हर किसी को चाहिए प्रशंसा।
(जुगुप्सा : ग्लानि, अरुचि)
जब सक्षम चुप हो जाते हैं,
अप्रिय भी घट जाते हैं,
जब कर्मठ मौन साधते हैं,
तब अंधे बटेर ले जाते हैं।
दुनिया किसको छोड़ती है,
राम को भी गाली बकती है,
दुनिया कुछ नहीं भूलती है,
सोच, तू किस खेत की मूलती है।
— पुखराज छाजेड़
