जुबान के बोल
विष केवल साँपों में नहीं,
इंसाँ भी उगल जाता है,
कटु वचनों की ज्वाला में,
अपनों को ही जलाता है।
महाभारत की अग्नि भी,
जुबाँ से भड़क उठती है,
और प्रेम भरे दो मीठे बोल,
पत्थर दिल पिघलाती है।
चुगली, क्रोध, अहंकार,
मन में तम भर जाते हैं,
मीठे, सरल, संयमित शब्द,
रिश्तों में दीप जलाते हैं।
म्यान से निकला तीर कभी,
लौट नहीं फिर पाता है,
जुबाँ से निकला एक वचन,
जीवन भर तड़पाता है।
इसलिए वाणी में अपनी,
विवेक का श्रृंगार करो,
घायल मन के सूनेपन पर,
प्रेमिल शब्दों की धार करो।
जिसने अपनी जुबाँ जीती,
उसने जग को जीत लिया,
मीठे शब्दों की शक्ति ने,
पत्थर दिल पिघला दिया।
— मुनीष भाटिया
