कविता

जुबान के बोल

विष केवल साँपों में नहीं,
इंसाँ भी उगल जाता है,
कटु वचनों की ज्वाला में,
अपनों को ही जलाता है।

महाभारत की अग्नि भी,
जुबाँ से भड़क उठती है,
और प्रेम भरे दो मीठे बोल,
पत्थर दिल पिघलाती है।

चुगली, क्रोध, अहंकार,
मन में तम भर जाते हैं,
मीठे, सरल, संयमित शब्द,
रिश्तों में दीप जलाते हैं।

म्यान से निकला तीर कभी,
लौट नहीं फिर पाता है,
जुबाँ से निकला एक वचन,
जीवन भर तड़पाता है।

इसलिए वाणी में अपनी,
विवेक का श्रृंगार करो,
घायल मन के सूनेपन पर,
प्रेमिल शब्दों की धार करो।

जिसने अपनी जुबाँ जीती,
उसने जग को जीत लिया,
मीठे शब्दों की शक्ति ने,
पत्थर दिल पिघला दिया।

— मुनीष भाटिया

मुनीष भाटिया

जन्म स्थान : यमुनानगर (हरियाणा) उपलब्धियां: विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित लेख एवं कविताएँ I प्रकाशन: चार कविता संग्रह एवं तीन निबंध संग्रह, तीन quote बुक्स राष्ट्रीय एवं अंतर्राष्ट्रीय स्तर की दस हजार से अधिक पत्र पत्रिकाओं में वर्ष 1989 से निरंतर प्रकाशन I 5376, एरोसिटी, ऍफ़ ब्लाक, मोहाली -पंजाब M-7027120349 munishbhatia122@gmail.com

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