उफ़ ये गर्मी
शोले बरसें गगन से,भट्ठी बनी जमीन
मट्ठा, लस्सी, शीतरस, सत्तू हुए कुलीन
सत्तू हुए कुलीन, गरम हो रही हवाएं
खुद को पालनहार, समझने लगीं दवाएं
कह सुरेश झुलसाइ रहा रवि हौले-हौले
बांदा से बांद्रा तक बरस रहे हैं शोले ।
— सुरेश मिश्र
शोले बरसें गगन से,भट्ठी बनी जमीन
मट्ठा, लस्सी, शीतरस, सत्तू हुए कुलीन
सत्तू हुए कुलीन, गरम हो रही हवाएं
खुद को पालनहार, समझने लगीं दवाएं
कह सुरेश झुलसाइ रहा रवि हौले-हौले
बांदा से बांद्रा तक बरस रहे हैं शोले ।
— सुरेश मिश्र