कविता

भीषण गर्मी

ये चिलचिलाती भीषण गर्मी और प्यास तन-मन,
अधीर थका मांदा रूखा-सुखा सा हुआ है जीवन,
नौ तपा ने भी दिखाया अब ज्वलंत हाय तौबा रंग,
चुभती सूरज की किरणें और लू कर रही है तंग ।

अधिक मास और जेठ की लम्बी खटकती दुपहरी,
जैसे लगता सजीवता कुछ पल के लिए हो ठहरी,
प्यासे पशु-पक्षी जीव-जंतु बेहाल हुई सारी नगरी,
व्याकुल हुए वृक्ष इंसान जीवनयापन बना मजबूरी ।

बड़ी तीव्रता से गर्मी बढ़ रही है दिन दुना रात चौगुनी,
नभ से बरसे अंगारे झुलसी काया लपटों से भूनी,
वृक्षों की शाखाएं भी हो रही है सूखी खगवृदों से सूनी,
पल-पल सता रहीं अजीब सी बढ़ती बेचैनी अंदरूनी ।

इंसानी फितरत स्वार्थ में शुद्ध पर्यावरण से बनाई दूरी,
अनदेखी से जिन्दगी हुई “आनंद” रहित आधी-अधूरी,
पर प्रकृति का पर्यावरण संतुलन चक्र घूमें अपनी धूरी,
सब सहयोगी बन कर्म करें जो सर्व हितकर हो जरूरी ।

थामें एक दूसरे का हाथ इंसानियत की रीत अपनाएँ,
पेड़ लगाएँ, पेड़ो की सुरक्षा करे और जंगल बचाएँ
पानी का उचित इस्तेमाल करें और बूँद बूँद बचाएँ,
बेजुबान बेसहारों का सहारा बन जीवन सफल बनाएँ ।

— मोनिका डागा “आनंद”

*मोनिका डागा 'आनंद'

चेन्नई, तमिलनाडु

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