कविता

लक्ष्मण रेखा

नारी संस्कार बीज बोएगी, 

जब स्वयंसिद्धा हो जाएगी,

मर्यादा की लक्ष्मण रेखा,

आप ही खिंच जाएगी।।

मर्यादा में रहें जब पानी,

मर्यादा में रहें जब अग्नी,

मर्यादा में रहें सोच हमारी,

खुशहाल होती हैं जिंदगानी।।

स्नेह की रिमझिम हो जब,

अनुशासन लगाम हो जब,

संस्कारों की तेज छिन्नी से,

सुन्दर शिल्प गढ़ा जाता हैं तब।।

बरगद की छाँव तले ,

सतरंगे सपने जो बुने ,

अपनों के आशीष से,

सच होंगे ख्वाब सारे।।

*चंचल जैन

मुलुंड,मुंबई ४०००७८

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