हंसगति छंद
रवि किरणों का ताप, धूप झुलसाती।
पशु पक्षी बेहाल, प्यास तरसाती।।
लू से बचना आप, छाँस हैं पीना।
बरगद की हो छाँव, प्रेम से जीना।।
काटे हमने पेड़, उगाएं प्यारे।
बने हुए जो ठूँठ, हरे हो सारे।।
गलती मनुज सुधार, चेतना जागे।
रिश्तों में हो नेह, रेशमी धागे।।
