गीतिका/ग़ज़ल

ग़ज़ल

सामान पहले कीजिए मुस्कान के लिए
थोड़ी मिठाई पेश है प्रधान के लिए

चेहरे पे इक हसीन सी मुस्कान के लिए
बज़्म-ए-तरब सजाई है मेहमान के लिए

रंजिश हमारे बीच की मिट जाएगी ज़रुर
हम फिर मिलेंगे एक ही अरमान के लिए

भंवरा तो दिन के ढलते ही ख़ुद क़ैद हो गया
अच्छा लगा था सौदा ये रसपान के लिए

बदनामियों का ख़ौफ़ न दिल में कोई रहे
कुछ अच्छे काम कीजिए ईमान के लिए

— नमिता राकेश

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