जवाब एक विकृत मानसिकता को
मत भूल, नारी केवल घर की नहीं,
समाज और सभ्यता के सम्मान की पहचान होती है,
संस्कारों की धड़कन, परिवार की मुस्कान होती है।
पर तू तो जाति के मद में डूबा हुआ,
अपने ही बनाए दायरों में कैद खड़ा है,
मानवता से कोसों दूर, अहंकार के शिखर पर चढ़ा है।
सोचता हूं, तू अपनी माँ, बहन, बेटियों को
किस दृष्टि से देखता होगा,
क्या अब भी उन्हें पुरानी जंजीरों में ही बांधता होगा?
तेरी पीड़ा का कारण यही है कि
जिन्हें तुमने सदियों तक
पायदान से अधिक नहीं समझा,
उन्हीं में से एक बेटी ने
जन-जन के विश्वास का मुकाम रचा।
संविधान की राह पर चलकर
न्याय और प्रशासन का मान बढ़ाया,
समाज के हर वर्ग को साथ लेकर
समानता का दीप जलाया।
लेकिन जाति के संकरे नालों में पलने वाले
खुले आकाश का अर्थ कहाँ जानेंगे,
स्वयं को विश्लेषक कहने वाले
पूर्वाग्रहों से बाहर कहाँ आ पाएंगे।
तुम्हारे होंगे असंख्य देवी-देवता,
हम तो जीवित संघर्षों को प्रणाम करते हैं,
जो मानवता के पथ पर चलकर
नया इतिहास रचते हैं।
याद रख, समय का चक्र निरंतर घूमता है,
वर्चस्व का हर किला एक दिन अवश्य टूटता है।
जब बराबरी की चेतना
हर हाथ में मशाल बन जाएगी,
तब घृणा की सारी दीवारें
अपने ही भार से ढह जाएंगी।
और तब भी यदि तेरा मन परिवर्तन न स्वीकारे,
तो समझ लेना— समस्या समाज में नहीं,
तेरे विचारों के अंधकार में है।
— राजेन्द्र लाहिरी
