दोस्तों के बीच दबी ज़ुबान में उनके इश्क़ की चर्चाएं आम थीं
सालों बीत गए। शहर के उस मशहूर बीएड कॉलेज की वो चहल-पहल, वो नई उम्र, नए अहसास और आंखों में सजे सुनहरे सपने अब ढलती शाम की तरह शांत हो चुके थे। मुश्ताक़ अब ज़िंदगी की क़शमक़श, करियर बनाने की फिक्र और जिम्मेदारियों के बोझ तले दबे, उम्र के एक संजीदा पड़ाव पर थे। उन्हें लगता था कि ज़िंदगी के इस रंगमंच पर उनका और उनकी महबूबा का किरदार बस वहीं तक था, और कहानी का अंत जुदाई की उसी एक शाम के साथ हो चुका है।
मगर कायनात के रंगमंच का असली मुसन्निफ (लेखक) तो कोई और था, जिसने इस कहानी के लिए एक ऐसा सस्पेंस चुन रखा था जो मुश्ताक़ ने कभी ख़्वाब में भी नहीं सोचा था।
अतीत के झरोखे में झांकें तो वो मंज़र आज भी उतना ही ज़िंदा था। जब दोनों ने पहली बार उस कॉलेज की चौख़ट पर क़दम रखा था, तब चारों तरफ़ एक अजीब सी चमक-दमक थी। नई उम्र का वो जोश, वो नए-नए अहसास और एक-दूसरे को देखने की वो तड़प… सब कुछ हवाओं में घुला हुआ था। ब्लैकबोर्ड पर जब प्रोफ़ेसर साहब टीचिंग मेथड्स और मनोविज्ञान के पाठ पढ़ा रहे होते थे, तब मुश्ताक़ की नजरें क्लासरूम की खिड़की से छनकर आने वाली धूप की तरह चोरी-छिपे सिर्फ़ उन्हें ही ढूंढा करती थीं। जब कभी वो भी पलटकर देख लेतीं, तो मुश्ताक़ के दिल की धड़कनें पूरी क्लास में सबसे तेज हो जाती थीं।
कॉलेज के गलियारों में, लाइब्रेरी के पीछे और कैंटीन की आख़िरी मेज़ पर होने वाली मुलाक़ातों से पूरे कॉलेज में कानाफूसियां होने लगी थीं। दोस्तों के बीच दबी ज़ुबान में उनके इश्क़ की चर्चाएं आम थीं, लोग मुस्कुराकर उन्हें देखते और आपस में इशारे करते थे। लेकिन वे दोनों? वे तो इन सब चर्चाओं से बिल्कुल बेख़बर, अपनी ही एक जादुई दुनिया में मग्न थे। उन्हें न तो ज़माने के तानों का होश था और न ही किसी और बात की परवाह। जब सीधे मिलना मुश्किल होता, तो बीएड की मोटी-मोटी असाइनमेंट फ़ाइलों और किताबों के पन्नों के बीच एक-दूसरे को ख़त लिखकर छोड़ देना उनका रोज़ का क़ायदा बन चुका था। वो ख़त नहीं, बल्कि उनके धड़कते हुए दिलों के दस्तावेज थे।
फ़िर देखते ही देखते बीएड का वो दौर ख़त्म हुआ, डिग्री हाथ में आई और ज़िंदगी का अमली रंगमंच शुरू हो गया। हक़ीक़त की दुनिया कॉलेज के ख़्वाबों जैसी ख़ूबसूरत नहीं थी। नौकरी की तलाश, समाज का दबाव, परिवार की उम्मीदें और मुस्तकबिल (भविष्य) को संवारने की अंधी दौड़ ने धीरे-धीरे उनके पैरों के नीचे से ज़मीन खींच ली। हालात के बेरहम थपेड़ों के बीच आख़िरकार एक ऐसी शाम आई, जिसने हमेशा के लिए दोनों के रास्तों को दो अलग-अलग सिम्त (दिशाओं) में मोड़ दिया। वो जुदाई की शाम किसी क़यामत से कम नहीं थी, जहां दोनों के दिल तो साथ धड़क रहे थे, पर रास्ते जुदा थे।
जुदाई के बाद के वो साल किसी मुसलसल इम्तिहान और रूहानी अज़ाब (पीड़ा) की तरह थे।
“कुछ लोग ज़िंदगी में बहुत कम वक़्त के लिए आते हैं, मगर अपनी मोहब्बत, और अपनाइयत के ऐसे नकुश निशानात छोड़ जाते हैं कि बरसों बाद भी उनकी याद दिल को मुस्कुरा देती है।”
वे जिस्मानी तौर पर तो एक-दूसरे से कोसों दूर हो गए थे, लेकिन वो यादें, वो बातें और वो पुराने ख़त मुश्ताक़ का इकलौता सरमाया (पूंजी) बन चुके थे। कितनी ही रातें उन्होंने जागकर गुज़ारीं, बिस्तर पर अकेले तन्हा करवटें बदलते हुए सिर्फ़ और सिर्फ उन्हीं पुराने अहसासों के सहारे जिए। हर आहट पर ऐसा लगता मानो वो कशिश आज भी उन्हें पुकार रही हो। दिल बार-बार ख़ुद से सवाल करता था कि क्या इस हसीन रंगमंच पर हमारा किरदार बस इतना ही छोटा लिखा था? क्या इस तड़प का कोई अंत नहीं?
सालों बाद, वक़्त का पहिया घूमा। शहर में एक बड़ी राष्ट्रीय शैक्षिक कॉन्फ्रेंस का आयोजन था। बाहर आसमान से आषाढ़ की बेहद तेज, मूसलाधार बारिश हो रही थी, जिसकी भारी बूंदें खिड़कियों के कांच से टकराकर एक अजीब सी ख़ामोश और बेचैन कर देने वाली धुन पैदा कर रही थीं। हॉल के भीतर मद्धम पीली रोशनियां थीं और चारों तरफ़ संजीदा (गंभीर) चेहरों की सुगबुगाहट थी। मुश्ताक़ हाथ में कॉफ़ी का कप लिए, खिड़की के पास अकेले खड़े होकर बाहर गिरते पानी को देख रहे थे। अचानक, बिना किसी वजह के उनका दिल इतनी तेज़ी से धड़कने लगा, मानो सीने से बाहर आ जाएगा, ठीक वैसा ही रोमांच और वैसी ही बेचैनी, जैसी सालों पहले बीएड कॉलेज के पहले दिन उनके दिल में जागी थी, तभी हॉल के भारी मुख्य दरवाजे से एक खातून (महिला) अंदर दाख़िल हुईं। बारिश की बौछारों से भीगने से बचने के लिए उन्होंने अपने पल्लू को थोड़ा संभाल रखा था और कुछ बूंदें उनके चेहरे पर मोतियों की तरह चमक रही थीं।
मुश्ताक़ ने जैसे ही एक अनजानी कशिश के तहत पलटकर देखा, उनकी सांसें हलक में अटक गईं। उनके हाथ में थमा कॉफ़ी का कप हल्का सा कांप गया और चंद बूंदें फ़र्श पर गिर पड़ीं। वक़्त जैसे हमेशा के लिए ठहर गया। आसपास की सारी आवाजें, लोगों की गुफ़्तगू, और बाहर की मूसलाधार बारिश का शोर… सब कुछ एक झटके में बिल्कुल ख़ामोश हो गया। सामने वही चेहरा था, वही आंखें थीं, जिन्हें उन्होंने बरसों तक अपनी रातों की बेचैन करवटों में तलाशा था। न वो उम्र बची थी, न वो बीएड कॉलेज का ज़माना था, लेकिन जब दोनों की नजरें आपस में टकराईं, तो सदियों का फ़ासला एक पल के रोमांच में सिमट गया।
उनकी आंखों में आज भी वही पुराना इख़्लास – सच्चाई और वही रूहानी अपनापन साफ़ झलक रहा था। लेकिन कहानी का सबसे बड़ा रोमांच और सस्पेंस तो अब सामने आने वाला था। इतने सालों की आंधियां भी उस डायरी को उनसे अलग नहीं कर पाई थीं। वक्त गुजर गया था, पर उनकी मोहब्बत का इख्लास आज भी उतना ही जवान था।
वे दोनों बिना कुछ बोले, क़दमों के भारीपन को भुलाकर एक-दूसरे के क़रीब आए। किसी के पास कहने को कोई शब्द नहीं था, पूरी कायनात ख़ामोश थी, पर दोनों की आंखों से अविरल बहते आंसू बरसों की तन्हाई और तड़प की पूरी दास्तान ख़ुद बयां कर रहे थे। उस दिन मुश्ताक़ की रूह को समझ आया कि वह फ़लसफ़ा कितना मुकम्मल और सच्चा था,मुख्तसर रहो, मगर मुखलिस रहो” उनका कॉलेज का साथ भले ही वक्त के तराज़ू में बहुत छोटा (मुख़्तसर) था, लेकिन उसकी सच्चाई (इख़्लास) इतनी अटूट और गहरी थी कि ज़िंदगी की तेज़ रफ़्तार और वक़्त के बड़े-बड़े बवंडर भी उन्हें हमेशा के लिए जुदा नहीं रख सके।
हॉल के उस एकांत कोने में, जहां बंद खिड़की के पास से बारिश की ठंडी बौछारें हल्की सी अंदर आ रही थीं, मुश्ताक़ ने आगे बढ़कर कांपते हाथों से उनके दोनों हाथों को थाम लिया। इस बार यह हाथ किसी मजबूरी में छूटने के लिए या जुदा होने के लिए नहीं, बल्कि ज़िंदगी के आख़िरी सफ़र तक, हर मोड़ पर साथ निभाने के लिए थामा गया था।
ज़माने की बंदिशें, समाज का डर, और अतीत के सारे शिक़ायत वे-शिकायतें उसी बारिश के पानी में बहकर हमेशा के लिए फ़ना (नष्ट) हो गए। मुश्ताक़ ने उनकी रोती हुई पर मुस्कुराती आंखों में गहराई से देखते हुए हौसले और मोहब्बत से भरे लहजे में कहा, “बीएड कॉलेज के गलियारे से शुरू हुई हमारी यह कहानी अधूरी नहीं थी… यह तो बस इस हसीन और रोमांचक मोड़ का इंतजार कर रही थी।”
हॉल के बाहर चलती हुई ठंडी हवाओं, बादलों की गड़गड़ाहट और गूंजती बारिश के गवाहों के बीच, दोनों ने जिंदगी की इस तेज रफ़्तार में फिर से हमेशा-हमेशा के लिए एक साथ क़दम से कदम मिलाकर चलने का अटूट अहद (क़सम) लिया। यही मुश्ताक़ की कहानी का सबसे मुकम्मल और जादुई क्लाइमेक्स था, और यही उनकी पूरी जिंदगी का कुल हासिल था।
— डॉ. मुश्ताक़ अहमद शाह सहज़
