ब्रिटेन में बार-बार बदलते प्रधानमंत्री और भारत की लोकतांत्रिक परिपक्वता
ब्रिटेन के प्रधानमंत्री कीर स्टार्मर के इस्तीफ़े की खबर ने एक बार फिर विश्व राजनीति का ध्यान अपनी ओर आकर्षित किया है। यह वही ब्रिटेन है जिसकी मुद्रा पाउंड आज भी विश्व की सबसे मजबूत मुद्राओं में गिनी जाती है। यह वही राष्ट्र है जिसने औद्योगिक क्रांति का नेतृत्व किया, आधुनिक संसदीय लोकतंत्र की अनेक परंपराओं को विकसित किया और एक समय ऐसा था जब कहा जाता था कि “ब्रिटिश साम्राज्य का सूरज कभी अस्त नहीं होता।” पश्चिम से लेकर पूर्व तक उसके उपनिवेश फैले हुए थे और विश्व राजनीति, व्यापार, विज्ञान तथा सैन्य शक्ति पर उसका गहरा प्रभाव था।
इतिहास का एक महत्वपूर्ण और प्रेरणादायक पक्ष यह भी है कि आज से लगभग 75 वर्ष पूर्व भारत इसी ब्रिटेन का उपनिवेश था। उस समय भारत को गरीब, पिछड़ा और शासन चलाने में अक्षम बताने का प्रयास किया जाता था। भारतीयों को बराबरी का सम्मान नहीं दिया जाता था। औपनिवेशिक मानसिकता में यह विश्वास था कि भारत बिना ब्रिटिश शासन के आगे नहीं बढ़ सकता। किंतु इतिहास का प्रवाह किसी एक धारणा का स्थायी बंधक नहीं होता।
आज परिस्थितियाँ बदल चुकी हैं। पिछले एक दशक में ब्रिटेन ने डेविड कैमरून, थेरेसा मे, बोरिस जॉनसन, लिज़ ट्रस, ऋषि सुनक और कीर स्टार्मर जैसे प्रधानमंत्रियों का दौर देखा है। कैमरून को ब्रेक्ज़िट जनमत संग्रह के बाद पद छोड़ना पड़ा। थेरेसा मे ब्रेक्ज़िट समझौते पर राजनीतिक सहमति नहीं बना सकीं। बोरिस जॉनसन को विवादों और पार्टी के भीतर असंतोष का सामना करना पड़ा। लिज़ ट्रस की आर्थिक नीतियाँ वित्तीय अस्थिरता का कारण बनीं और उनका कार्यकाल अत्यंत अल्पकालिक रहा। ऋषि सुनक को आर्थिक चुनौतियों और राजनीतिक दबावों का सामना करना पड़ा, जबकि अब कीर स्टार्मर के इस्तीफ़े ने ब्रिटेन की राजनीतिक अस्थिरता पर नए प्रश्न खड़े कर दिए हैं।
ध्यान देने योग्य बात यह है कि इन परिवर्तनों के पीछे केवल व्यक्तिगत कारण नहीं थे। ब्रेक्ज़िट के बाद की आर्थिक चुनौतियाँ, बढ़ती महँगाई, प्रवासन के प्रश्न, स्वास्थ्य सेवाओं पर दबाव, जनता का घटता विश्वास और राजनीतिक दलों के भीतर बढ़ते मतभेद लगातार ब्रिटेन की राजनीति को प्रभावित करते रहे हैं। इनमें से अधिकांश प्रधानमंत्रियों को प्रत्यक्ष भ्रष्टाचार के कारण नहीं, बल्कि जनविश्वास में कमी, नीतिगत विफलताओं, राजनीतिक असहमति और नेतृत्व संकट के कारण पद छोड़ना पड़ा। यह स्थिति बताती है कि केवल विकसित अर्थव्यवस्था, मजबूत मुद्रा, आधुनिक विज्ञान और शक्तिशाली सैन्य क्षमता किसी राष्ट्र को स्थायी राजनीतिक स्थिरता नहीं दे सकती।
दूसरी ओर भारत का अनुभव उल्लेखनीय है। अनेक सामाजिक, आर्थिक और भौगोलिक चुनौतियों के बावजूद भारत ने लोकतांत्रिक स्थिरता, नीति-निरंतरता और राष्ट्रीय आत्मविश्वास का परिचय दिया है। पिछले वर्षों में भारत ने डिजिटल क्रांति, आधारभूत संरचना, अंतरिक्ष विज्ञान, रक्षा क्षेत्र, वैश्विक कूटनीति और आर्थिक विकास के क्षेत्र में महत्वपूर्ण उपलब्धियाँ प्राप्त की हैं। विश्व के अनेक देशों की दृष्टि आज भारत की ओर आशा और सम्मान के साथ उठ रही है।
भारत की शक्ति केवल उसकी अर्थव्यवस्था में नहीं, बल्कि उसकी संस्कृति और सभ्यता में भी निहित है। भारतीय चिंतन सदियों से “वसुधैव कुटुम्बकम्”, “सर्वे भवन्तु सुखिनः” और “लोकाः समस्ताः सुखिनो भवन्तु” जैसे आदर्शों का वाहक रहा है। यहाँ शासन को केवल सत्ता नहीं, बल्कि लोकमंगल का माध्यम माना गया है। भारतीय परंपरा हमें सिखाती है कि शक्ति का उपयोग वर्चस्व के लिए नहीं, बल्कि सेवा और कल्याण के लिए होना चाहिए। यही कारण है कि विविधताओं से भरे इस विशाल राष्ट्र में लोकतंत्र केवल एक राजनीतिक व्यवस्था नहीं, बल्कि सामाजिक संस्कार के रूप में विकसित हुआ है।
वैज्ञानिक दृष्टि से भी किसी राष्ट्र की दीर्घकालिक सफलता का आधार केवल धन या संसाधन नहीं होता। सामाजिक विश्वास, संस्थागत स्थिरता, सांस्कृतिक आत्मविश्वास और दूरदर्शी नेतृत्व उतने ही आवश्यक होते हैं। ब्रिटेन के पास मजबूत मुद्रा, उन्नत विज्ञान, शक्तिशाली सेना और गौरवशाली इतिहास है, फिर भी राजनीतिक अस्थिरता उसकी चुनौती बनी हुई है। वहीं भारत सीमित संसाधनों से शुरुआत करके आज स्थिरता, विकास और वैश्विक सम्मान का उदाहरण प्रस्तुत कर रहा है।
यह कहना उचित नहीं होगा कि ब्रिटेन असफल है या भारत पूर्णतः आदर्श। प्रत्येक राष्ट्र की अपनी चुनौतियाँ और अपनी उपलब्धियाँ होती हैं। किंतु यह अवश्य कहा जा सकता है कि जिस भारत को कभी कमज़ोर, पिछड़ा और दूसरों पर निर्भर समझा जाता था, वही भारत आज आत्मविश्वास, लोकतांत्रिक स्थिरता और वैश्विक प्रतिष्ठा के क्षेत्र में नई ऊँचाइयाँ प्राप्त कर रहा है।
इतिहास का यह परिवर्तन किसी राष्ट्र की हार या जीत की कहानी नहीं है। यह समय की उस शक्ति का प्रमाण है जो परिश्रम, संस्कृति, लोकतंत्र और राष्ट्रीय संकल्प के आधार पर नई संभावनाएँ निर्मित करती है। कभी जिस भारत को कमज़ोर, पिछड़ा और दूसरों पर निर्भर समझा जाता था, वही भारत आज आत्मविश्वास, नवाचार, सांस्कृतिक चेतना और लोकतांत्रिक स्थिरता के बल पर विश्व मंच पर सम्मानपूर्वक खड़ा है।
आज विश्व को यह समझने की आवश्यकता है कि किसी राष्ट्र की वास्तविक शक्ति केवल उसकी सेना, मुद्रा, वैज्ञानिक उपकरणों या तकनीकी प्रगति में नहीं होती। स्थायी शक्ति उसके नागरिकों के विश्वास, सांस्कृतिक मूल्यों, नैतिक नेतृत्व, सामाजिक समरसता और लोकतांत्रिक संस्थाओं की मजबूती में निहित होती है। भारत की वर्तमान यात्रा इसी सत्य का जीवंत उदाहरण है। संभवतः यही कारण है कि आज विश्व भारत को केवल एक उभरती हुई आर्थिक शक्ति के रूप में नहीं, बल्कि एक ऐसे सभ्यतागत राष्ट्र के रूप में भी देख रहा है, जिसके पास आधुनिकता और परंपरा, विज्ञान और अध्यात्म, विकास और लोकतंत्र के संतुलन का एक विशिष्ट मॉडल प्रस्तुत करने की क्षमता है।
— राकेश चन्द्र शुक्ला
