भाषा-साहित्य

लेखक का धर्म और विचारों की अनंत यात्रा

यह सवाल किसी भी संजीदा और संवेदनशील क़लमकार के आत्म-मंथन का सबसे बुनियादी और गहरा बिंदु है कि हम आख़िर लिख क्यों रहे हैं और क्या हमारा मक़सद सिर्फ चंद अख़बारों के पन्नों में जगह पाना, नाम कमाना या सुर्ख़ियों में बने रहना है, या फ़िर हमारी क़लम उस समाज का एक बेहद पारदर्शी और बेबाक आईना है जिसे हम रोज़ अपनी आँखों से देखते हैं, महसूस करते हैं और जिसके दर्द को अपने सीने में समेटते हैं।
एक सच्चा लेखक कभी भी सिर्फ़ छपने की सतही होड़ या सस्ती शोहरत का हिस्सा नहीं होता बल्कि जब वह अपने आस-पास के परिवेश को देखता है, समाज में पनपती विडंबनाओं, बिख़रते मानवीय मूल्यों, टूटते रिश्तों, आम इंसान के तीख़े संघर्षों और व्यवस्था की कमियों को महसूस करता है, तो उसके भीतर एक गहरी बेचैनी और हलचल पैदा होती है जो अंततः शब्दों का रूप लेकर कागज़ पर बिख़रने के लिए मजबूर हो जाती है।
हम सिर्फ़ इसलिए नहीं लिखते कि लोग हमारे शब्दों को पढ़ें, बल्कि हम इसलिए लिखते हैं कि लोग उन शब्दों के पीछे छिपे हुए विचारों की तड़प को समझें, समाज की वास्तविक स्थिति से रू-ब-रू हों और जो कुछ भी हमारे आस-पास घटित हो रहा है उस पर तटस्थ होकर सोचने तथा आत्म-परीक्षण करने के लिए मजबूर हो जाएँ, क्योंकि साहित्य और लेखन का असली काम मनोरंजन करना नहीं बल्कि सोई हुई मानवीय चेतना को झकझोरना और एक वैचारिक क्रांति की ज़मीन तैयार करना है।
अख़बारों की सुर्खियाँ, तारीखे़ं और पन्ने तो वक़्त की गर्त में बहुत जल्दी पुराने हो जाते हैं और रद्दी के भाव बिक जाते हैं, लेकिन पूरी ईमानदारी, संवेदनशीलता और बिना किसी मिलावट के लिखे गए विचार युगों-युगों तक ज़िंदा रहते हैं, क्योंकि इतिहास इस बात का जीवंत गवाह है कि जब-जब समाज में नैतिक पतन हुआ है या अंधेरा घना हुआ है, तब-तब क़लम कारों की स्याही ने ही मशाल बनकर जन-चेतना को जगाने, जन-आंदोलनों को हवा देने और मानव सभ्यता को सही दिशा दिखाने का ऐतिहासिक कार्य किया है।
आज के इस दौर में जहाँ हर तरफ़ शोर है, स्वार्थ है और लोग अपनी ही धुन में मसरूफ़ हैं, वहाँ लेखक की ज़िम्मेदारी और भी ज़्यादा बढ़ जाती है क्योंकि वह समाज की उस मूक और मर्मस्पर्शी अंतरात्मा की आवाज़ होता है जिसे अक्सर दबा दिया जाता है या जो इस आपाधापी में अनसुनी रह जाती है, और इसी दबी हुई आवाज़ को, शोषितों के दर्द को और समाज की अच्छाइयों व बुराइयों को बिना किसी डर के सामने लाना ही लेखक का सबसे बड़ा नैतिक धर्म है।
लेखन दरअसल लेखक का समाज के साथ किया गया एक मूक समझौता और एक पवित्र अनुबंध है जिसके तहत वह आने वाली पीढ़ियों के लिए अपने दौर के सच, संस्कृति, उतार-चढ़ाव और मानवीय संवेदनाओं का एक ऐसा जीवंत दस्तावेज़ तैयार करता है जिसे समय की कोई भी आंधी धुंधला नहीं कर सकती, और जब तक दुनिया में अन्याय, पीड़ा और बदलाव की आकांक्षा रहेगी, तब तक यह कलम अपनी पूरी ताकत और धार के साथ समाज को राह दिखाती रहेगी।

— डॉ. मुश्ताक़ अहमद शाह ‘सहज़’

डॉ. मुश्ताक़ अहमद शाह

पिता का नाम: अशफ़ाक़ अहमद शाह जन्मतिथि: 24 जून जन्मस्थान: ग्राम बलड़ी, तहसील हरसूद, जिला खंडवा, मध्य प्रदेश कर्मभूमि: हरदा, मध्य प्रदेश स्थायी पता: मगरधा, जिला हरदा, पिन 461335 संपर्क: मोबाइल: 9993901625 ईमेल: dr.m.a.shaholo2@gmail.com शैक्षिक योग्यता एवं व्यवसाय शिक्षा,B.N.Y.S.बैचलर ऑफ़ नेचुरोपैथी एंड योगिक साइंस. बी.कॉम, एम.कॉम बी.एड. फार्मासिस्ट आयुर्वेद रत्न, सी.सी.एच. व्यवसाय: फार्मासिस्ट, भाषाई दक्षता एवं रुचियाँ भाषाएँ, हिंदी, उर्दू, अंग्रेज़ी रुचियाँ, गीत, ग़ज़ल एवं सामयिक लेखन अध्ययन एवं ज्ञानार्जन साहित्यिक परिवेश में रहना वालिद (पिता) से प्रेरित होकर ग़ज़ल लेखन पूर्व पद एवं सामाजिक योगदान, पूर्व प्राचार्य, ज्ञानदीप हाई स्कूल, मगरधा पूर्व प्रधान पाठक, उर्दू माध्यमिक शाला, बलड़ी ग्रामीण विकास विस्तार अधिकारी, बलड़ी कम्युनिटी हेल्थ वर्कर, मगरधा साहित्यिक यात्रा लेखन का अनुभव: 30 वर्षों से निरंतर लेखन प्रकाशित रचनाएँ: 2000+ कविताएँ, ग़ज़लें, सामयिक लेख प्रकाशन, निरन्तर, द ग्राम टू डे, दी वूमंस एक्सप्रेस, एजुकेशनल समाचार पत्र (पटना), संस्कार धनी (जबलपुर),जबलपुर दर्पण, सुबह प्रकाश , दैनिक दोपहर,संस्कार न्यूज,नई रोशनी समाचार पत्र,परिवहन विशेष,समाचार पत्र, घटती घटना समाचार पत्र,कोल फील्ड मिरर (पश्चिम बंगाल), अनोख तीर (हरदा), दक्सिन समाचार पत्र, नगसर संवाद, नगर कथा साप्ताहिक (इटारसी) दैनिक भास्कर, नवदुनिया, चौथा संसार, दैनिक जागरण, मंथन (बुरहानपुर), कोरकू देशम (टिमरनी) में स्थायी कॉलम अन्य कई पत्र-पत्रिकाओं में निरंतर रचनाएँ प्रकाशित प्रकाशित पुस्तकें एवं साझा संग्रह साझा संग्रह (प्रमुख), मधुमालती, कोविड, काव्य ज्योति, जहाँ न पहुँचे रवि, दोहा ज्योति, गुलसितां, 21वीं सदी के 11 कवि, काव्य दर्पण, जहाँ न पहुँचे कवि (रवीना प्रकाशन) उर्विल, स्वर्णाभ, अमल तास, गुलमोहर, मेरी क़लम से, मेरी अनुभूति, मेरी अभिव्यक्ति, बेटियां, कोहिनूर, कविता बोलती है, हिंदी हैं हम, क़लम का कमाल, शब्द मेरे, तिरंगा ऊंचा रहे हमारा (मधुशाला प्रकाशन) अल्फ़ाज़ शब्दों का पिटारा, तहरीरें कुछ सुलझी कुछ न अनसुलझी (जील इन फिक्स पब्लिकेशन) व्यक्तिगत ग़ज़ल संग्रह: तुम भुलाये क्यों नहीं जाते तेरी नाराज़गी और मेरी ग़ज़लें तेरा इंतज़ार आज भी है (नवीनतम) पाँच नए ग़ज़ल संग्रह प्रकाशनाधीन सम्मान एवं पुरस्कार साहित्यिक योगदान के लिए अनेक सम्मान एवं पुरस्कार प्राप्त पाठकों का स्नेह, साहित्यिक मंचों से मान्यता मुश्ताक़ अहमद शाह जी का साहित्यिक और सामाजिक योगदान न केवल मध्य प्रदेश, बल्कि पूरे हिंदी-उर्दू साहित्य जगत के लिए गर्व का विषय है। आपकी लेखनी ने समाज को संवेदनशीलता, प्रेम और मानवीय मूल्यों से जोड़ा है। आपके द्वारा रचित ग़ज़लें और कविताएँ आज भी पाठकों के मन को छूती हैं और साहित्य को नई दिशा देती हैं।

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