बैसाखियों को त्यागकर अपनी वास्तविक योग्यता, ज्ञान और कौशल को पहचानो,
संसार में यदि आपको अपनी एक अमिट, विशिष्ट और सम्मानित पहचान स्थापित करनी है, तो आपको दूसरों के प्रभाव, रसूख या सिफारिशों की बैसाखियों को पूरी तरह त्यागकर अपने भीतर वास्तविक योग्यता, ज्ञान और कौशल का विकास करना होगा। वर्तमान दौर में जहाँ लोग अक्सर बड़े और सफल व्यक्तियों के साथ तस्वीरें खिंचवाने, उनके करीब दिखने या उनके नाम का सहारा लेकर ख़ुद को महत्वपूर्ण साबित करने की होड़ में लगे रहते हैं, वहीं यह दर्शन उस खोख़लेपन पर सीधा प्रहार करता है और समझाता है कि किसी रसूख़दार व्यक्ति के ‘दाएँ-बाएँ’ खड़े होकर मिलने वाली तवज्जो महज़ एक अस्थायी भ्रम है, क्योंकि किसी दूसरे के सूरज की रोशनी से चमकने वाला चंद्रमा अपनी खुद की कोई स्वतंत्र चमक नहीं रखता और जैसे ही वह सहारा हटता है, व्यक्ति का ख़ुद का वजूद भी पूरी तरह धुंधला और समाप्त हो जाता है। इसके विपरीत, जब आप शॉर्टकट का रास्ता छोड़ते हैं और अपनी पूरी ऊर्जा को आत्म-मंथन, कठिन परिश्रम, निरंतर सीखने की प्रक्रिया और अपने हुनर को तराशने में लगाते हैं, तब आपके भीतर जो ‘लियाक़त’ यानी योग्यता पैदा होती है, वह एक ऐसी स्थायी और अमूल्य संपत्ति होती है जिसे न तो कोई आपसे छीन सकता है और न ही समय के साथ उसकी प्रासंगिकता कम होती है। सच्चा आत्म-सम्मान और वास्तविक गरिमा इसी आत्मनिर्भरता से जन्म लेती है, क्योंकि जब आप अपनी काबिलियत के दम पर शिखर पर पहुँचते हैं, तो आपको किसी के नाम के सहारे की आवश्यकता नहीं होती, बल्कि समाज स्वतः ही आपकी प्रतिभा का लोहा मानता है और लोग आपके साथ खड़े होने में गर्व की अनुभूति करने लगते हैं। इसलिए, दूसरों की परछाईं बनकर अपने वजूद को ज़ाया करने के बजाय, हर इंसान को अपनी आंतरिक क्षमताओं को पहचानकर खुद को इस योग्य बनाना चाहिए कि वह भीड़ का हिस्सा बनने के बजाय भीड़ से अलग अपनी एक मुकम्मल पहचान बना सके, क्योंकि अंततः संसार में केवल और केवल आपकी ख़ुद की योग्यता, आपका चरित्र और आपकी कर्मठता ही आपकी असली और स्थायी पहचान तय करती है।
— डॉ. मुश्ताक़ अहमद शाह सहज़
