धरती डोली एक पल, काँपे घर-दरबार
धरती डोली एक पल, काँपे घर-दरबार।
रोया सारा देश फिर, टूटा जन-आधार॥
मलबों में दबते रहे, कितने सपने-प्राण।
भाषण देते रह गए, सत्ता के भगवान॥
जुटी कैमरों भीड़ में, गायब था व्यवहार—
रोया सारा देश फिर, टूटा जन-आधार॥
खोल प्रकृति ने दिये, झूठे सारे भेद।
महलों वाले ढूँढ़ते, जीवन का अब खेद॥
धन-दौलत सब रह गई, मिट्टी के अधिकार—
रोया सारा देश फिर, टूटा जन-आधार॥
दर्द आपदा में जहाँ, चलता अपना खेल।
राहत बनकर बिक गया, मानवता का तेल॥
भूखे बच्चे पूछते, किसका यह त्योहार—
रोया सारा देश फिर, टूटा जन-आधार॥
ईंटों से घर बन गए, दिल कब पाए ठौर।
करुणा जिनके पास थी, वही बने सिरमौर।।
सेवा से बढ़कर नहीं, कोई भी उपकार—
रोया सारा देश फिर, टूटा जन-आधार॥
‘सौरभ’ भूचालों फँसी, धरा रही अब डोल।
झूठे सिंहासन हिलें, खुल जाएँ सब पोल॥
न्याय, दया, संवेदना, सबसे बड़ा आधार—
रोया सारा देश फिर, टूटा जन-आधार॥
✍️ डॉ. प्रियंका सौरभ
