यह तो साधारण बात नहीं
हर मनुष्य का अपना मन होता है
उसी दिशा में वह चलता है
जो कुछ वह बोलता है,
जो कुछ वह करता है,
जो कुछ वह मानता है
उसी को सत्य समझता है।
अपनी सुख – सुविधाओं की पूर्ति के हेतु
परिस्थितियों के अनुरूप
अपने विचार
अपना व्यवहार
अपना व्यवहार बदलता है और
अपनी मान्यताऍं बदल देता है।
वह अपने हर परिवर्तन का
तर्क गढ़ता है
अपने हर निर्णय का
समर्थन करता है,
दूसरे के दोषों को ढूंढ कर
उन्हें दोषी ठहराने की चेष्टा करता है।
यही स्वभाव है मनुष्य का
अपने आपको श्रेष्ठ समझना
विश्वास और कल्पनाओं के सहारे
निरंतर कदम बढ़ाते रहना।
वह अपनी गरिमा को
दिखने की चेष्टा करता है,
अल्पों को डराता है और
अपने पॉंव के तले
कुचलाता रहता है।
अधिकार, जाति, धर्म, प्रांत
भाषा, रंग की विषमताओं में
अपना अस्तित्व खोजता है और
उन्हीं सीमाओं में
अपना सांस लेता है।
देश काल परिस्थितियाॅं एक समान
कभी नहीं रहती हैं,
यह स्वाभाविक भी है
मनुष्य का जीवन भिन्न – भिन्न रहना।
सबको समझना और स्वीकार करना
महाकरूणिक व करूणामय बनना
यह तो साधारण बात भी नहीं है,
मनुष्य की वह श्रेष्ठ साधना है।
