कांग्रेस का अयोध्या दौरा आस्था कम, आडंबर अधिक
उत्तर प्रदेश की राजनीति में एक नया मोड़ आ गया है। जो कांग्रेस वर्षों से रामलला से दूरी बनाकर चलती रही, जिसके नेता अयोध्या जाने से परहेज करते रहे, वही कांग्रेस अब रामलला के मंदिर में चंदा चोरी की आँच में अपनी राजनीतिक रोटी सेंकने के लिए अयोध्या की ओर दौड़ पड़ी है। 30 जून को लखनऊ से एक 9 सदस्यीय कांग्रेस प्रतिनिधिमंडल अयोध्या के लिए रवाना होगा। यूपी कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय के नेतृत्व में यह दल सुबह 9 बजे लखनऊ से रवाना होगा। इस दल में सांसद किशोरी लाल और राकेश राठौर शामिल हैं, जबकि सांसद उज्ज्वल रमण और तनुज पुनिया पहले से ही अयोध्या में मौजूद रहेंगे। इस दल का मकसद रामलला के दर्शन-पूजन के साथ-साथ मीडिया के सामने चंदा चोरी प्रकरण को और हवा देना है। सवाल यह उठता है कि जिस पार्टी के नेता कभी प्रभु श्रीराम को काल्पनिक बताते थे और जिसने सुप्रीम कोर्ट तक में राम मंदिर निर्माण के खिलाफ दलीलें दीं, उसका यह अचानक राम प्रेम क्यों जाग उठा? इस प्रश्न का उत्तर उत्तर प्रदेश के आगामी 2027 विधानसभा चुनाव में छिपा है। यह मामला उत्तर प्रदेश में सियासी बवाल बन गया है, क्योंकि अगले साल 2027 में विधानसभा चुनाव होने वाले हैं। ऐसे में हर दल इस मुद्दे पर अधिकतम राजनीतिक लाभ उठाने की होड़ में लगा हुआ है। कांग्रेस को लग रहा है कि चंदा चोरी के इस मामले में उसे भाजपा को घेरने का सुनहरा अवसर मिला है, क्योंकि इस पूरे घोटाले की जड़ें सीधे भाजपा समर्थित ट्रस्ट से जुड़ी हैं।
कांग्रेस नेता अजय राय और आराधना मिश्रा ने कहा कि भाजपा-आरएसएस ने देश के करोड़ों रामभक्तों की आस्था के साथ बड़ा छल किया है और धर्म के नाम पर एक संगठित लूट को अंजाम दिया है। अजय राय ने तो यहाँ तक दावा किया कि इस महाघोटाले के लिए सीधे तौर पर देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जिम्मेदार हैं, क्योंकि उनके प्रधान सचिव रहे नृपेंद्र मिश्र को श्रीराम मंदिर निर्माण समिति का अध्यक्ष बनाया गया। कांग्रेस की माँग है कि इस पूरे मामले की इलाहाबाद हाई कोर्ट के सिटिंग जज द्वारा समयबद्ध जाँच करवाई जाए और दोषियों पर कड़ी कार्रवाई हो।पूरे घटनाक्रम में एक और दिलचस्प पहलू है। अजय राय ने दावा किया कि मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ अयोध्या तब गए, जब कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष उनसे पहले वहाँ जा चुके थे। उन्होंने तंज कसते हुए कहा कि जब योगी को पता चला कि कांग्रेस वहाँ पहुँच गई है, तभी वे अयोध्या पहुँचे। यह बयान दर्शाता है कि कांग्रेस इस दौरे को केवल धार्मिक यात्रा नहीं, बल्कि एक सुविचारित राजनीतिक दाँव के रूप में देख रही है। कांग्रेस को इस मामले में उत्तर प्रदेश की भाजपा सरकार द्वारा गठित एसआईटी पर भरोसा नहीं है और इसीलिए वह अयोध्या पहुँचकर मीडिया के सामने इस मुद्दे को जीवित रखना चाहती है।
उधर, इसी दौरान समाजवादी पार्टी की भी अपनी अलग रणनीति चल रही है। जैसे ही 8 लोगों की गिरफ्तारी हुई, अखिलेश यादव ने इसे सीधे योगी सरकार की नाकामी और भाजपा के चरित्र से जोड़ दिया। अयोध्या के सांसद और सपा नेता अवधेश प्रसाद ने कहा कि उनकी पार्टी और अखिलेश यादव, जिन्होंने इस मुद्दे को उजागर किया, ने इस बड़े घोटाले की उच्च-स्तरीय जाँच की माँग की है। सपा खुद को इस मामले में पहलकर्ता के रूप में स्थापित करना चाहती है, क्योंकि उसका दावा है कि यह मुद्दा पहले उसी ने उठाया था।अब जब कांग्रेस भी इसी मैदान में उतर आई है, तो सपा और कांग्रेस के बीच एक अघोषित प्रतिस्पर्धा छिड़ गई है। दोनों दल एक-दूसरे से आगे निकलकर रामभक्तों की नाराजगी को भुनाना चाहते हैं। सपा, जो यूपी में कांग्रेस की सहयोगी है, यह नहीं चाहती कि कांग्रेस इस मुद्दे पर उसकी जमीन काट ले। अखिलेश यादव ने कहा कि आस्था के साथ इतनी बड़ी धोखाधड़ी की कल्पना कौन कर सकता था? जिन लोगों ने दूसरों पर चोरी के झूठे आरोप लगाए, भगवान ने अब उनकी अपनी असली चोरी सबके सामने ला दी है।
दूसरी ओर, भाजपा और योगी सरकार इस सारे घटनाक्रम पर पैनी नजर रखे हुए हैं। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने कहा कि सपा और कांग्रेस ने सुप्रीम कोर्ट में राम मंदिर के खिलाफ लड़ाई लड़ी थी, रामभक्तों पर गोली चलाई थी और राम नवमी पर दंगे कराए थे। उन्होंने कहा कि ऐसे लोग बुरी नीयत से यह मुद्दा उठा रहे हैं। अगर किसी के पास कोई सबूत है, तो एसआईटी को सौंप दें। योगी ने यह भी स्पष्ट किया कि सरकार पूरी निष्पक्षता से जाँच कर रही है और दोषी किसी भी सूरत में नहीं बचेंगे।भाजपा ने सपा के चंदा चोरी वाले नैरेटिव को काउंटर करने की रणनीति अपनाई है। इसके तहत पहला, प्रशासनिक स्तर पर कड़ा रुख अपनाकर, और दूसरा, राजनीतिक रूप से मथुरा का मुद्दा उछालकर। योगी ने अखिलेश को सीधे ललकारा कि मथुरा में भगवान श्रीकृष्ण की भूमि पर अपना स्टैंड साफ करें। यह रणनीति विपक्ष को रक्षात्मक मुद्रा में लाने की है।
अब प्रश्न यह है कि कांग्रेस को इस पूरे सियासी खेल से वास्तव में कितना लाभ होगा? सच यह है कि कांग्रेस का यह चरित्र परिवर्तन उत्तर प्रदेश की जनता को अच्छी तरह याद है। जो पार्टी दशकों तक राम मंदिर आंदोलन के विरोध में खड़ी रही, जिसके नेताओं ने राम सेतु को काल्पनिक बताया, जिसने कोर्ट में मंदिर निर्माण को रोकने की कोशिश की, उस पार्टी का अचानक रामलला के दरबार में दर्शन-पूजन के लिए उमड़ पड़ना एक राजनीतिक विवशता अधिक है, न कि आस्था का प्रकटीकरण।हाँ, इतना जरूर है कि चंदा चोरी के इस मामले ने भाजपा और उसके नेताओं की विश्वसनीयता पर सवालिया निशान जरूर लगाया है और विपक्ष को एक ठोस राजनीतिक हथियार दिया है। लेकिन यूपी की राजनीति में राम के नाम पर मिलने वाला श्रेय अक्सर उसी को मिलता है, जिसकी साख पहले से जुड़ी हो, और यहीं कांग्रेस की सबसे बड़ी सीमा है।
— अजय कुमार
