कोई यहाँ कबीर है
कोई यहाँ कबीर है, लगता कोई मीर।
भीतर-भीतर है छुपी, सबके कोई पीर।।
हँसते चेहरों के तले, दर्दों की जागीर।
बाहर सावन-सा लगे, भीतर सूखी नीर।।
मुस्कानों के बीच भी, बसती गहरी पीर—
कोई यहाँ कबीर है, लगता कोई मीर।।
कोई शब्दों में जिए, कोई साधे मौन।
अपने-अपने घाव का, साक्षी होता कौन।।
आँसू पीकर जी रहे, कितने ही गंभीर—
कोई यहाँ कबीर है, लगता कोई मीर।।
दौलत, शोहरत, मान सब, देते झूठी धीर।
मन का सूनापन ही, कहता सच्ची पीर।।
भीतर टूटा आदमी, बाहर बने अमीर—
कोई यहाँ कबीर है, लगता कोई मीर।।
रिश्तों की भी भीड़ में, कितने रहे अधीर।
अपने होकर दे गए, मन को गहरी पीर।।
जिनको समझा आसरा, निकले वही शमशीर—
कोई यहाँ कबीर है, लगता कोई मीर।।
‘सौरभ’ मन को पढ़ सके, वही सच्चा फकीर।
दर्द पराए बाँट ले, वही असली वीर।।
चेहरे पढ़ना छोड़कर, पढ़ लो मन की पीर—
कोई यहाँ कबीर है, लगता कोई मीर।
भीतर-भीतर है छुपी, सबके कोई पीर।।
— डॉ. सत्यवान सौरभ
