प्रकृति
प्रकृति से हुईं छेड़छाड़
पानी बोतलों में बिक गया
समय कह रहा
अभी भी
अपने मैं ले आओ बदलाब
नहीं तो तरस जाओगे
पानी के साथ साथ
साँस लेने को हवा से भी
प्रकृति को न करो विकृत
दोहन इतना भी न करों
खत्म हो जाएं जो जंगल
ऐसे विकास का क्या होगा
कौन भोगेगा उसे
जो भोगने वाले ही न रहें
धरा पर सीमेंट के जंगल नहीं
पेड़ पौधों के जंगल उगाइये
तभी बचेगी यह धरा
सुरक्षित रहेगा जीवन भी हमारा
