संघर्षों को भूल गया?
संघर्षों को तू भी भूल गया,मैं भी भूल गया,
जिनकी उम्मीदों पर था भरोसा,
उसी ने दिया शूल नया।
तू भी जीए जा रहा, मैं भी जीए जा रहा,
जिस नरक से बड़ी कठिनाई से निकले थे कभी,
फिर उसी ज़हर का प्याला पीए जा रहा।
सदियों की पीड़ा कैसे इतनी जल्दी भूल बैठे?
चंद मीठे शब्दों पर अपना विवेक ही बेच बैठे।
उसी को रहनुमा मान लिया हमने,
जिसने घाव दिए थे तन ही नहीं, मन पर भी।
कुछ लोग ऊँचाइयों तक पहुँच गए,
पर समाज आज भी खड़ा है वहीं का वहीं।
तन पर सूट-बूट आ गया,
पर विचारों में परिवर्तन न आया।
महामानवी मंशा को छोड़कर
दिखावे का रास्ता अपनाया।
झूठी प्रशंसा का जाल बिछाकर
छल करने वाले आज भी मुस्कुरा रहे हैं,
और हम उन्हें अपना हितैषी समझकर
अपने ही पथ से भटकते जा रहे हैं।
जिस समाज ने पहचान दी,
जिसने चलना और संभलना सिखाया,
उसे लौटाया क्या?
क्या अपने जैसा
एक भी जागरूक इंसान तैयार कर पाया?
जब समाज का ऋण चुकाने का समय आया,
तब तूने चमत्कारों के पीछे कदम बढ़ाए।
चंद चापलूसों की संगत में
अपने ही नए प्रतिमान गढ़ डाले।
याद रख,
अजगर आज भी राह में
मुंह फैलाए बैठा है।
दौड़ ले जितना दौड़ सकता है ऐ खरगोश,
पर यदि इतिहास,संघर्ष और चेतना को भूल गया,
तो अंत में तेरी मंजिल बनेगी
उनका भयंकर आगोश।
संघर्षों की विरासत संभाल,
इतिहास का मान रख।
जो पीढ़ियाँ जागकर चली थीं,
उनके सपनों की पहचान रख।
व्यक्ति की नहीं, समाज की जीत में
अपना सम्मान रख।
— राजेन्द्र लाहिरी
