गीत/नवगीत

जगमग जलना सीखो तुम

अंधियारे में बन प्रकाश पुंज जगमग जलना सीखो तुम,
टूटी हुई उम्मीदों को फिर से हँसकर चुनना सीखों तुम ।

जीवन के संघर्षों से घबराकर क्यों बैठे हो इतने उदास,
हार गए मन से जो तुम फिर कहो कैसे हो पाएगा विकास,
तूफ़ानों से डरकर क्यों बैठे सपनों के तट पर होकर निराश,
नाव तुम्हारी पार लगेगी मन में हो रोशन जब आत्मिक प्रकाश,
दुर्दिन दिनों के अनचाहे मौसम को हिम्मत से हटाना सीखो तुम,
अंधियारे में बन प्रकाश पुंज जगमग जलना सीखो तुम ।

हार को महत्त्व दे क्यों लूटा दिया मन-मस्तिष्क का हुलास,
अँधेरे में विलीन हुआ “आनंद” बदला हँसी-ख़ुशी का विन्यास,
सपनों को बिखरते देख मन में बसाया निराशा का निवास,
एक तारे के बस टूटने पर खो दी तुमने क्यों अपनी मिठास,
लक्ष्य को करना है हासिल खुद पर यकीन करना सीखो तुम,
अंधियारे में बन प्रकाश पुंज जगमग जलना सीखो तुम ।

सितारों से भरा आसमान राही पग अपने बढ़ा बदल इतिहास,
दुनिया कहे जो कहने दें मन को मत डिगा तू चल बस बिंदास,
परवाह नहीं की हारने की वो ही मिटा सके हार की खटास,
हुनरवान तू तक़दीर की दीवारों को ढहा मिटा मन का संत्रास,
सकारात्मकता से असंभव को संभव बनाना सीखो तुम,
अंधियारे में बन प्रकाश पुंज जगमग जलना सीखो तुम ।

— मोनिका डागा “आनंद”

*मोनिका डागा 'आनंद'

चेन्नई, तमिलनाडु

Leave a Reply