गीत/नवगीत

बहुत सताती गर्मी

सूरज बाबा क्यों गुस्सा हो?
हम सबको क्यों रहे हो भून!
करवा दो न! रिमझिम वर्षा,
जल्दी से भेजो मानसून।

सूख रहे हैं पेड़ और पौधे,
जीव – जन्तु सब भटकें प्यासे।
बहे पसीना, कपड़े लथपथ,
घर से निकले अच्छे – खासे।
नहीं खेलने आते बाहर,
साथी जो थे अफलातून।

हर मौसम अच्छा होता है,
लेकिन बहुत सताती गर्मी।
थोड़ी ठण्डी हवा चला दो,
तेवर में कुछ लाओ नरमी।
कहने को वर्षा ऋतु आई,
तपे जुलाई, जैसे जून ।

पापा सँग बाजार गया था,
छाता – रेनकोट ले आया।
रखे पैक कबसे ज्यों के त्यों,
उन्हें निकालूँ कब, पछताया।
मन करता है गर्मीभर अब
मैं बस जाऊँ देहरादून।
करवा दो न! रिमझिम वर्षा,
जल्दी से भेजो मानसून।

— गौरीशंकर वैश्य विनम्र

*गौरीशंकर वैश्य विनम्र

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