दर्पण
हम बस दर्पण देख रहे हैं।
छद्म समर्पण देख रहे हैं।
आग छिपी पत्थर में होती,
केवल घर्षण देख रहे हैं।
तन में नहीं, समस्या मन में,
रूपाकर्षण देख रहे हैं।
जीवित से कुछ मोह नहीं था,
अन्तिम तर्पण देख रहे हैं।
सम आवेशी बीच बलों में,
घोर विकर्षण देख रहे हैं।
हिमनद, बूँद, बर्फ बन जाता,
घन – जल – वर्षण देख रहे हैं।
— गौरीशंकर वैश्य विनम्र
