सामाजिक

जीवन का ‘शून्य’ और हमारी भागदौड़ का अर्थ

जीवन की पूरी यात्रा एक ऐसे अंतहीन राजमार्ग की तरह है, जहाँ हम अनगिनत पड़ावों को पार करते हुए एक मंज़िल की तलाश में जुटे रहते हैं, पर क्या हमने कभी ठहरकर यह सोचा है कि इस आपाधापी, इस अथक श्रम और भौतिक संसाधनों के संचय के अंत में हमारे हाथ क्या लगेगा? हम ‘कर लूँ जमा दौलत-ओ-ज़र, उसके बाद क्या?’ के उस बुनियादी सवाल को अक्सर अपनी व्यस्तताओं के शोर में दबा देते हैं, जबकि यही वह प्रश्न है जो हमें इंसान होने की सच्ची परिभाषा से रूबरू कराता है। दरअसल, हमारी तमाम उपलब्धियां, सजे-धजे आशियाने और दुनियावी शोहरत का गुमान, वक्त की रेत पर बनी उन लकीरों की तरह है जो पहली लहर के साथ ही अपना अस्तित्व खो देती हैं। साहित्य और शेर-ओ-शायरी केवल मनोरंजन का माध्यम नहीं, बल्कि उस रूहानी ठहराव का आईना हैं, जहाँ हम अपनी रूह से मिलते हैं, और जब हम अपनी भावनाओं को ग़ज़ल के सांचे में ढालते हैं, तो हम केवल शब्द नहीं गढ़ते, बल्कि उन अनकहे सच को कागज़ पर उतारते हैं जो भीड़ में कहीं खो गए थे। जीवन का शाश्वत सत्य तो वही है कि ‘उठी थी ख़ाक, ख़ाक से मिल जाएगी वहीं’, यह एक ऐसा दर्शन है जो हमारे भीतर के अहंकार को गलाकर करुणा की खाद बनता है, क्योंकि यदि हम यह हृदय से स्वीकार कर लें कि मिट्टी से बने इस पुतले को अंततः उसी मिट्टी में विलीन होना है, तो फ़िर नफ़रत, द्वेष और पद-प्रतिष्ठा के मोह का कोई औचित्य शेष नहीं रह जाता। हमारा जीवन महज़ एक सांख्यिकीय डेटा या संपत्तियों का लेखा-जोखा नहीं है, बल्कि यह उन निश्छल पलों का समूह है जो हमने किसी के दुःख को साझा करके, किसी के चेहरे पर मुस्कान बिखेरकर या अपनों की आँखों में प्रेम बनकर जिए हैं। अंततः, जब ज़िंदगी का चिराग़ बुझने को होगा, तब दौलत और पद की रसीदें नहीं, बल्कि हमारे द्वारा किए गए परोपकार और प्रेम की ख़ुशबू ही हमारे साथ जाएगी, इसलिए इस यात्रा के दौरान उस ‘शून्य’ को पहचानना आवश्यक है जहाँ हम सब एक समान हैं, ताकि अंत में जब यह सवाल ज़हन में उठे कि ‘उसके बाद क्या?’, तो हमारे पास उत्तर में पछतावे की जगह एक संतुष्ट मुस्कान हो।

— डॉ. मुश्ताक़ अहमद शाह सहज़ 

डॉ. मुश्ताक़ अहमद शाह

पिता का नाम: अशफ़ाक़ अहमद शाह जन्मतिथि: 24 जून जन्मस्थान: ग्राम बलड़ी, तहसील हरसूद, जिला खंडवा, मध्य प्रदेश कर्मभूमि: हरदा, मध्य प्रदेश स्थायी पता: मगरधा, जिला हरदा, पिन 461335 संपर्क: मोबाइल: 9993901625 ईमेल: dr.m.a.shaholo2@gmail.com शैक्षिक योग्यता एवं व्यवसाय शिक्षा,B.N.Y.S.बैचलर ऑफ़ नेचुरोपैथी एंड योगिक साइंस. बी.कॉम, एम.कॉम बी.एड. फार्मासिस्ट आयुर्वेद रत्न, सी.सी.एच. व्यवसाय: फार्मासिस्ट, भाषाई दक्षता एवं रुचियाँ भाषाएँ, हिंदी, उर्दू, अंग्रेज़ी रुचियाँ, गीत, ग़ज़ल एवं सामयिक लेखन अध्ययन एवं ज्ञानार्जन साहित्यिक परिवेश में रहना वालिद (पिता) से प्रेरित होकर ग़ज़ल लेखन पूर्व पद एवं सामाजिक योगदान, पूर्व प्राचार्य, ज्ञानदीप हाई स्कूल, मगरधा पूर्व प्रधान पाठक, उर्दू माध्यमिक शाला, बलड़ी ग्रामीण विकास विस्तार अधिकारी, बलड़ी कम्युनिटी हेल्थ वर्कर, मगरधा साहित्यिक यात्रा लेखन का अनुभव: 30 वर्षों से निरंतर लेखन प्रकाशित रचनाएँ: 2000+ कविताएँ, ग़ज़लें, सामयिक लेख प्रकाशन, निरन्तर, द ग्राम टू डे, दी वूमंस एक्सप्रेस, एजुकेशनल समाचार पत्र (पटना), संस्कार धनी (जबलपुर),जबलपुर दर्पण, सुबह प्रकाश , दैनिक दोपहर,संस्कार न्यूज,नई रोशनी समाचार पत्र,परिवहन विशेष,समाचार पत्र, घटती घटना समाचार पत्र,कोल फील्ड मिरर (पश्चिम बंगाल), अनोख तीर (हरदा), दक्सिन समाचार पत्र, नगसर संवाद, नगर कथा साप्ताहिक (इटारसी) दैनिक भास्कर, नवदुनिया, चौथा संसार, दैनिक जागरण, मंथन (बुरहानपुर), कोरकू देशम (टिमरनी) में स्थायी कॉलम अन्य कई पत्र-पत्रिकाओं में निरंतर रचनाएँ प्रकाशित प्रकाशित पुस्तकें एवं साझा संग्रह साझा संग्रह (प्रमुख), मधुमालती, कोविड, काव्य ज्योति, जहाँ न पहुँचे रवि, दोहा ज्योति, गुलसितां, 21वीं सदी के 11 कवि, काव्य दर्पण, जहाँ न पहुँचे कवि (रवीना प्रकाशन) उर्विल, स्वर्णाभ, अमल तास, गुलमोहर, मेरी क़लम से, मेरी अनुभूति, मेरी अभिव्यक्ति, बेटियां, कोहिनूर, कविता बोलती है, हिंदी हैं हम, क़लम का कमाल, शब्द मेरे, तिरंगा ऊंचा रहे हमारा (मधुशाला प्रकाशन) अल्फ़ाज़ शब्दों का पिटारा, तहरीरें कुछ सुलझी कुछ न अनसुलझी (जील इन फिक्स पब्लिकेशन) व्यक्तिगत ग़ज़ल संग्रह: तुम भुलाये क्यों नहीं जाते तेरी नाराज़गी और मेरी ग़ज़लें तेरा इंतज़ार आज भी है (नवीनतम) पाँच नए ग़ज़ल संग्रह प्रकाशनाधीन सम्मान एवं पुरस्कार साहित्यिक योगदान के लिए अनेक सम्मान एवं पुरस्कार प्राप्त पाठकों का स्नेह, साहित्यिक मंचों से मान्यता मुश्ताक़ अहमद शाह जी का साहित्यिक और सामाजिक योगदान न केवल मध्य प्रदेश, बल्कि पूरे हिंदी-उर्दू साहित्य जगत के लिए गर्व का विषय है। आपकी लेखनी ने समाज को संवेदनशीलता, प्रेम और मानवीय मूल्यों से जोड़ा है। आपके द्वारा रचित ग़ज़लें और कविताएँ आज भी पाठकों के मन को छूती हैं और साहित्य को नई दिशा देती हैं।