बहुत गहरा है जाति का चश्मा
पैदा होते ही आँखों पर, एक चश्मा चढ़ाया जाता है,
इंसाँ को इंसान नहीं, बस नाम-गोत्र सिखाया जाता है।
वो चश्मा जो हर मंज़र को, एक खास रंग में ढालता है,
न्याय हो या नफ़रत, सब जाति देखकर पालता है।
जब अदालत की दहलीज़ पर, इंसाफ़ की गुहार होती है,
तब कानून की आँखों पर पट्टी, और समाज की नज़र पैनी होती है।
कटघरे में खड़ा बेगुनाह भी, मुजरिम मान लिया जाता है,
अगर उसकी जाति का पलड़ा, तराजू में कमज़ोर पाया जाता है।
न्याय की देवी का तराजू भी, यहाँ डगमगा जाता है,
जब ‘जाति का चश्मा’ पहनकर, फैसला सुनाया जाता है।
एक तरफ तो गोली चलती है, और एनकाउंटर हो जाता है,
अखबारों की सुर्ख़ियों में, उसे ‘न्याय तुरंत’ बताया जाता है।
पर गौर से देखो उस वर्दी को, जिसने बंदूक उठाई थी,
और उस सीने को भी देखो, जिसने वो गोली खाई थी।
क्या सच में वो मुजरिम था, या बस जाति का वो शिकार हुआ?
चश्मा बदल कर देखो साहेब, यहाँ वर्दी का भी जातिवार हुआ।
दफ्तर की उस कुर्सी पर, जब काबिलियत शर्माती है,
जब मेहनत की फ़ाइलें, धूल में दबाई जाती हैं।
प्रमोशन का वो हक़दार, पीछे ही छूट जाता है,
क्योंकि उसकी साख का सिक्का, ऊंची जाति में नहीं भुनाता है।
हुनर, डिग्रियां, तजुर्बा सब, धरे के धरे रह जाते हैं,
जब प्रमोशन की लिस्ट में, सिर्फ ‘अपने नाम’ आगे आते हैं।
गली के उस नुक्कड़ पर, जब घृणा की आग सुलगती है,
बिना कसूर के किसी की, पूरी बस्ती जलती है।
सिर्फ़ इसलिए कि उसका पानी, तुम्हारी प्यास को मंज़ूर नहीं,
उसका छूना पाप हुआ, जैसे उसका कोई वजूद नहीं।
ये नफ़रत की दीवारें, सदियों से खड़ी हैं सीना ताने,
जाति के इस चश्मे ने, इंसानों को बाँटा खानों में।
पर इसी बीच कहीं जब, दो दिल धड़कने लगते हैं,
जाति की सूखी ज़मीन पर, प्यार के गुलशन खिलते हैं।
वो प्यार जो चश्मा उतारकर, सिर्फ़ रूह को तकता है,
पर ये समाज उस प्यार को भी, मज़हब-जाति में कसता है।
कहीं ऑनर किलिंग की भेंट, वो मासूम मोहब्बत चढ़ती है,
तो कहीं जाति की वेदी पर, दो ज़िंदगियां रोती हैं।
उतार फेंको इस चश्मे को, जो हर रिश्ते को धुंधला करता है,
जो इंसानियत के मज़हब को, हर रोज़ कत्ल करता है।
जब तक आँखों पर ये चश्मा रहेगा, समाज कभी न सुधरेगा,
न्याय, तरक्की, और प्यार का सूरज, इस देश में कैसे उगेगा?
— राजेन्द्र लाहिरी
