धर्म
धर्म को कर्मकांड और अंध विश्वास मानकर धीरे- धीरे समाज धर्म से विमुख होता चला गया और परिणाम सभी के समक्ष है।
*‘धर्म इति धारयेत्’* अर्थात जो धारण किया जाय वही धर्म है। इसीलिए हमारे मनीषियों व समाज शास्त्रियों ने हमारे सभी अच्छे- बुरे कर्मों को धर्म से जोड़ दिया था।
तात्पर्य यह कि हमारे अच्छे कर्मों से धर्म का उत्थान तथा बुरे कर्मों से धर्म की हानि होने की मान्यता थी और सम्पूर्ण समाज इसका निष्ठा से पालन करता था।
इसका अभ्यास करते- करते प्रत्येक व्यक्ति *धर्मभीरु* हो जाता था। भीरु का अर्थ डरपोक या कायर नहीं है बल्कि कष्ट सहकर तथा हानि उठाकर भी कोई ऐसा कार्य नहीं करना जिससे धर्म की हानि हो।
जब हम सभी अपने सत्कर्मों से अपने *‘धर्मा बैंक’* का बैलेंस बढ़ाने लगेंगे तथा बैलेंस घटाने वाला दुष्कर्म कदापि नहीं करेंगे तो वह दिन दूर नहीं जब अपना भारत *सुजलाम्- सुफलाम्* की समृद्धि को पाकर अपने पूर्व गौरव को शीघ्र ही प्राप्त करेगा।
— प्रेम चन्द्र शुक्ल
