कहानी

कहानी – हम साथ-साथ है

पति की मृत्यु के बाद शिला ने कारोबार का सारा बोझ अपने सिर ले लिया। आखिर करती भी क्या, पेट तो पालना ही पड़ेगा!
आज मन बड़ा अशांत था। करीब रात दस बज रहे थे। हर रात की तरह वह आज भी खाता बही ठीक-ठाक करने में जोर-जोर से लगी पड़ी थी। कलम आगे बढ़ ही नहीं रहा था। यादों की शिशकिया मन मस्तिष्क को कुरेद रही थी, यदि आज वह होते तो इतना अत्यधिक काम का दबाव मुझ पर न होता। पेमेंट कलेक्शन का अलग दबाव ! आज जुगाड़ नहीं हुआ, कल आ जाना, अगले हफ्ते पक्का ! यह सब सुन शीला को बड़ा अनकस लगता, लेकिन बाजार है यहा मुंह मोड़ने से भी तो नही चलेगा।
उधर जिंदगी में अकेलापन मानो उसे काटने को दौड़ता। कभी अपने आप से तो कभी समय से घंटो शिकायत करती। क्यों छोड़ गए मुझे? काश तुम आज होते तो मुझ पर काम का इतना दबाव न होता, ना मुझे लोगों को बुझवल बुझाने पड़ते। न जाने क्या पाप किया था मैंने? फिर भी सच्ची को मेरी जिंदगी में भेज कर ऊपर वाले ने डूबती भैया को एक सहारा दे दिया। सचमुच यदि वह उस वक्त ना आया होता तो मेरी जिंदगी किसी गली के कुत्ते से कम न होती। क्या करती मैं सचमुच, आज में जो कुछ भी हू, सिर्फ सच्ची के वजह से ही हू। शायद इसीलिए आज भी उसकी एक मीठी ध्वनि मेरे लिए एनर्जी बूस्टर का काम करती है। वह दरवाजे पर आता तो मैं मुस्कुरा कर उसके स्वागत में खड़ी हो जाती हू। उसकी एक नजर मेरी पूरे दिन की खुराक होती थी, सब कुछ सही है, लेकिन कब हमारे रिश्ते इतने गंभीर हो गये, पता भी ना चला। अब तो इधर– उधर की बाते करते घंटो बित जाता। उनकी रिश्ते की गंभीरता एवं भावुकता बढ़ता ही जा रहा था। बातों ही बातों में सच्ची ने एक दिन हिम्मत कर शीला से अपने मन की बात कही।
‘ शीला जी, मैं आपसे विवाह करना चाहता हूं।’
शीला यह सुनती हुई कुछ पल तो मौन हो गई। सच्ची मै तुम्हारी भावनाओं की बहुत सम्मान करती हूं। मै तुम्हें अपना सब कुछ मानती हूं। तुम मेरे लिए एक फरिश्ता हो। मेरी सुबह भी तुमसे होती है, शाम भी तुमसे ही होती है। तुम्हारी दर्शन के बिना मेरा दिन अधूरा रह जाता है, लेकिन मुझे माफ करना मैं तुमसे विवाह नहीं कर सकती। मेरी उम्र अब ढल चुकी है, तुम अभी बिल्कुल नवयुवक हो, तुम्हारे सामने तुम्हारी पूरी जिंदगी पड़ी है, तुम्हें तो तुम्हारे हम उम्र की साथी मिलनी चाहिए। सच्ची ने बहुत समझाने की कोशिश की, लेकिन शीला अपने मन पर पत्थर रख अपने विचारों पर अडिग रही। उसके बाद भी दोनों के रिश्ते में किसी तरह का कोई परिवर्तन नहीं आया। दोनों अब भी घंटो बातें करते। उधर पिता की मृत्यु से सच्ची बिल्कुल अकेला पड़ चुका था। तभी एक दिन बातों ही बातों में शीला ने समझाते हुए कहा –तुमने जो मेरे लिए किया है, सचमुच उसके लिए मेरे पास आज कोई शब्द नहीं है, उसी तरह हमारा रिश्ता भी किसी शब्द का मोहताज नहीं है। वह विवाह से भी कहीं बड़ा है। हमारे बीच वह सभी रिश्ते हैं जो एक महिला– पुरुष, लड़का –लड़की में हो सकता हैं। सांत्वना का स्वर सुन सच्ची बिल्कुल मौन हो गया।
वक्त के साथ-साथ शीला का व्यवसाय भी बढ़ता ही गया। वह काम के बढते दबाव को देख कई और महिला कर्मचारियों को भी रोजगार दे दी। काका– काकी की इच्छा अनुसार अब सच्ची का विवाह की तैयारी भी शुरू हो गई। शीला यह सुनते ही बहुत खुश हुई, लेकिन उसके मन की द्वंदाता को समझते हुए बोली— सच्ची में तुम्हारी जो थी वह हमेशा ही रहूंगी, मन के सारे मैल को निकाल कर अपनी नई जिंदगी की शुरुआत करो। खुशियां तुम्हारा इंतजार कर रही है। उसका स्वागत करो।
सच्ची और नेहा का विवाह भी संपन्न हो गया। दोनों बहुत खुश थे। एक दिन अचानक नेहा के पेट में दर्द शुरू हुआ। डॉक्टर जाच से पता चला कि वह मां बनने वाली है। यह सुन सच्ची के साथ–साथ शिला को भी बहुत खुशी हुई। शीला और सच्ची के रिश्ते में अब भी कोई बदलाव न था। दोनों चुप्पी में भी एक दूसरी की हर भावनाओं को समझ लेते। उनके बीच शब्द कम मगर समझ बहुत ही ज्यादा होती थी।
नेहा पूरी तरह से अब — तब हो चुकी थी। नेहा और सच्ची के साथ शीला भी अस्पताल पहुंची। अत्यधिक जल और रक्तस्राव को देखते हुए डॉक्टर ने उसे फौरन एमरजैंसी रूम में डाल दिया, लेकिन हर संभव के प्रयास के बाद भी बच्चे की दुनिया में आते ही नेहा हमेशा के लिए अपनी आंखें बंद कर ली।
‘ लीजिए, आपका बेबी, ‘नर्स ने कुछ मुरझाए स्वर में कहा।
नर्स, क्या मैं नेहा से मिल सकता हूं।सच्ची ने पूछा
‘ नहीं,’ नर्स ने जवाब दिया। ‘ मगर क्यों, सच्ची ने घबराते हुए स्वर मे बोला।
‘ सॉरी, she was no more!’
‘ मगर कैसे ‘?’
सर, डिलीवरी के वक्त उनका प्रेशर लेवल बहुत कम हो गया था और बच्चे की प्रेशर के साथ ही वह. …।
यह सुनते ही सच्ची के साथ-साथ शीला पर भी दुखों का पहाड़ टूट पड़ा। एक तरफ नन्ही सी जान तो दूसरी तरफ बेजान पड़ी नेहा। शीला ने ही कागजी कार्रवाई से लेकर क्रिया –कर्म तक का सारा काम संभाला। सच्ची के परिस्थितिया देख शीला स्वयं ही बच्चे की सारी जिम्मेदारी उठाती। दोनो ने मिलकर ही बच्चे का नाम रोशन रछा। अब अधिकांश रोशन शीला के साथ ही रहता, जिससे सच्ची को भी यही रहने का अवसर मिल जाता। लेकिन सच्ची के चेहरे से हंसी तो मानो कहीं गायब सी हो गई थी।अब उदासी और चुप्पी उसके साथी बन चुके थे।
एक दिन दफ्तर से आते ही सच्ची का उतरा चेहरा देख— ‘क्या बात है आज कुछ ज्यादा ही थक गए हो’
‘ नहीं’, सच्ची ने बड़े संक्षेप में उत्तर दिया।
लेकिन अब मै बहुत अकेला जरूर हो गया हूं।
सच्ची ऐसी मत बोलो, मैं हूं ना तुमहारे साथ, तुम्हारी सब कुछ, और अभी तो रोशन भी है तुम्हारे सामने, तुम्हारी जिंदगी में रोशनी फ़ैलाने के लिए .. .. शिला ने समझाते हुए कहा।
वही तो चिंता है, कैसे यह बड़ा होगा, कैसे मैं सब कुछ संभाल पाऊंगा, सच्ची ने चिंता के स्वर मे कहा।
तुम चिंता मत करो, मैं हूं ना इसकी मां …!
यह सुनते ही सच्ची का चेहरा एक बार फिर दमक उठा, फिर तो मेरी भी आप… वह खुद की भावनाओं को रोक न सका।
शीला ने भी दोनों बाहे फैला दी। सच्ची को वक्त पर विश्वास नहीं हो रहा था। वह वही खडा रह गया। आओ.. शिला ने मधुर स्वर मे कहा।
नम आखे लिए सच्ची आगे बढा। दोनो की खुशियों का ठिकाना न रहा।
लेकिन आज अचानक कैसे!! सच्ची में जानने की इच्छा जताई।
‘ वक्त की यही मांग थी बस… इतना समझो इंसानियत की यही मांग थी, लेकिन हां एक गुजारिश है तुमसे ?
क्या ? सचची ने हतप्रभ से कहा।
मेरे न रहने पर भी मेरा कारोबार यूं ही रखना हमेशा। क्योंकि यह मेरे लिए सिर्फ एक कारोबार नहीं बल्कि कितने ही लोगों का जीविका का साधन है।
हां शीला जी, यह कोई कहने की बात है, लेकिन आप यह सब ङबात मत कीजिए। मेरा दिल बैठ जाता है।
सचमुच, भगवान ने तुम्हे मेरे पास भेज कर मुझे परिपूर्ण कर दिया। इस उम्र में बेटे का सुख दे दिया, और भला क्या चाहिए मुझे !
मै, तुम और रोशन तीनो हमेशा साथ-साथ रहेंगे।
शीला के मुख से एक ही ध्वनि निकली – ‘हम साथ –साथ हैं, ‘ सच्ची ने भी भरपूर साथ दे दिया…।’
— डोली शाह

*डोली शाह

1. नाम - श्रीमती डोली शाह 2. जन्मतिथि- 02 नवंबर 1982 संप्रति निवास स्थान -हैलाकंदी (असम के दक्षिणी छोर पर स्थित) वर्तमान में काव्य तथा लघु कथाएं लेखन में सक्रिय हू । 9. संपर्क सूत्र - निकट पी एच ई पोस्ट -सुल्तानी छोरा जिला -हैलाकंदी असम -788162 मोबाइल- 9395726158 10. ईमेल - shahdolly777@gmail.com