जंतर-मंतर अनशन, लोकतांत्रिक जवाबदेही, जन-भागीदारी और संवैधानिक अधिकारों की एक नई गूंज
सोनम वांगचुक का जंतर-मंतर पर किया गया अनशन मात्र एक विरोध प्रदर्शन नहीं, बल्कि भारतीय लोकतंत्र के उस जीवंत और सजग स्वरूप का सशक्त प्रतिबिंब है, जहाँ एक नागरिक अपनी संवैधानिक शक्तियों का उपयोग व्यवस्था को सुधारने की दिशा में करता है। यह आंदोलन केवल लद्दाख को छठी अनुसूची के अंतर्गत संवैधानिक सुरक्षा प्रदान करने, पर्यावरण संरक्षण सुनिश्चित करने और नीट जैसी प्रतियोगी परीक्षाओं में व्याप्त अनियमितताओं के विरुद्ध शिक्षा प्रणाली में पारदर्शिता लाने की मांग तक सीमित नहीं है, बल्कि यह देश के उन लाखों जागरूक नागरिकों की आवाज बन गया है जो व्यवस्था में सुधार की अपेक्षा रखते हैं।
भारतीय संविधान नागरिकों को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और शांतिपूर्ण तरीके से एकत्रित होने का मौलिक अधिकार देता है। वांगचुक का गांधीवादी अनशन लोकतंत्र के उस ‘सेफ्टी वाल्व’ की भांति है, जो सरकार और जनता के बीच की संवादहीनता को दूर करता है। एक परिपक्व लोकतंत्र में असहमति को राष्ट्र-विरोधी मानना एक बड़ी भूल है, वास्तव में, यह सुधार का एक अनिवार्य और लोकतांत्रिक साधन है।
इस आंदोलन की सबसे बड़ी शक्ति वह ‘जन-भागीदारी’ है जो सोनम वांगचुक के साथ खड़ी है। देश के विभिन्न हिस्सों से आए छात्र, पर्यावरणविद, सामाजिक कार्यकर्ता और सामान्य नागरिक इस अनशन के समर्थन में एकजुट हुए हैं। यह जन-समर्थन यह स्पष्ट करता है कि लद्दाख की सुरक्षा और शिक्षा प्रणाली में पारदर्शिता की मांग केवल वांगचुक की व्यक्तिगत मांग नहीं है, बल्कि यह एक राष्ट्रव्यापी चेतना का हिस्सा है। जनता का यह साथ दर्शाता है कि जब मुद्दे जनहित से जुड़े हों, तो देश की युवा शक्ति और जागरूक समाज स्वैच्छिक रूप से बिना किसी राजनीतिक प्रलोभन के एक मंच पर आने को तैयार है।
सोनम वांगचुक के आंदोलन का मूल मंतव्य सत्ता को अस्थिर करना नहीं, बल्कि प्रशासनिक खामियों की ओर सरकार का ध्यान आकर्षित करना है। जब कोई व्यक्ति लद्दाख के पारिस्थितिक तंत्र की रक्षा या छात्रों के भविष्य के लिए आवाज उठाता है, तो यह राष्ट्रहित में किया गया एक सकारात्मक प्रयास है। लोकतांत्रिक दृष्टिकोण से, किसी आंदोलन की वैधता उसके शांतिपूर्ण स्वरूप और जनहितकारी उद्देश्यों से तय होती है, और यह आंदोलन इन दोनों ही मापदंडों पर पूरी तरह खरा उतरता है।
दुर्भाग्यपूर्ण है कि इस आंदोलन को कुछ निहित स्वार्थों द्वारा व्यक्तिगत हमले और अभद्र टिप्पणियों के जरिए कमज़ोर करने का प्रयास किया गया। जब मुद्दों के स्थान पर वैचारिक ध्रुवीकरण को प्राथमिकता दी जाती है, तो यह लोकतांत्रिक विमर्श के स्तर को गिराता है। आलोचना का स्वागत करना एक परिपक्व लोकतंत्र की पहचान है, न कि उसे अपमानजनक भाषा या ध्रुवीकरण के जरिए कुचलना। जनता की आवाज़ को अनसुना करना या उसे ‘देशविरोध’ का नाम देना लोकतंत्र की जड़ों को कमजोर करता है।
सोनम वांगचुक का यह संघर्ष सरकार और नागरिक समाज के बीच एक सेतु की तरह है। सरकार को इन विरोधों को अपने विरुद्ध व्यक्तिगत हमले के रूप में न देखकर, एक सजग नागरिक द्वारा दिए गए रचनात्मक ‘फीडबैक’ के रूप में देखना चाहिए। लोकतंत्र की सार्थकता इसी में है कि विरोध के स्वरों का सम्मान हो और उन्हें दमन के बजाय सार्थक संवाद व तार्किक समाधानों के माध्यम से संबोधित किया जाए। अंततः देश का विकास और उसकी मज़बूती तभी संभव है जब नीति-निर्धारक और जागरूक नागरिक, एक साझा राष्ट्रहित के उद्देश्य के साथ क़दम से क़दम मिलाकर आगे बढ़ें।
— डॉ. मुश्ताक़ अहमद शाह सहज़
