डिग्रीधारी बेरोजगार
एम.ए,बी.टेक पास खड़े हैं,लेकर हाथ में झारा,
नौकरी की उम्मीद में देखो, चमक रहा सितारा,
कल तक जो कोडिंग की भाषा,रटते थे दिन-रात,
आज वो बेसन घोल रहे हैं,बदल गए हालात,
पकोड़ा तलते,तेल उबलते,सोच रहे मनमीत,
कस्टमर को क्रिस्पी पसंद है,यही जगत की रीत,
एमबीए की थ्योरी सारी,चटनी में मिल जाए,
जॉइनिंग लेटर की चाहत में,समोसा सिंकता जाए,
थक जाते जब तलते-तलते,तो ठेला चमकाते,
लौकी,कद्दू,आलू,बैंगन,लाइन से हैं सजाते।
कॉर्पोरेट की एक्सेल शीट सा,सजता है बाज़ार,
टमाटर के भाव में ढूंढें,अपना वो रोज़गार,
बॉस का यहाँ झंझट नहीं,न कोई डेडलाइन है,
पर नगर निगम की गाड़ी दिखे,तो बिगड़ती डिज़ाइन है,
वर्क फ्रॉम होम समझकर फिर,ठेला खूब भगाते,
गली-कूचे की सड़कों पर,वो मंदी को मात जताते,
शाम ढले फिर पीठ पर,भारी बैग है टांगते,
डिजिटल इंडिया के पहिए पर,रास्ते हैं मांगते,
दूसरों का पिज्जा-बर्गर,ठंडा होने ना पाए,
भले ही अपनी नौकरी का, फॉर्म ठंडा पड़ जाए!
द्वार-द्वार जाकर कहते हैं सर,आपका सामान,
रेटिंग वाले फाइव स्टार में,अटकी रहती जान,
खुद की किस्मत आउट ऑफ़ स्टॉक,फिर भी डिलीवर करते,
जॉइनिंग लेटर कब आएगा बस यही दुआ है करते।
— राजेन्द्र लाहिरी
