कृतघ्न हुआ है मानव
परम ईश की रचनात्मकता,
सृष्टि का अद्भुत स्वरूप,
रंगबिरंगे फूल-पत्ते, तितलियाँ,
प्रकृति के विविध रूप,
छटाएँ रम्य सुनहरी,
भोर की लालिमा,
संध्या की मोहिनी,
सुरमई रागिनी,
मनभावन, अत्त्युत्तम,
सृष्टि अलंकारिणी,
मकड़ियां बुनती हैं जाल,
प्रेम से, ध्यान से,
सहज नजाकत से,
इतना अचूक सृजन,
इतना सधा हुआ,
कौन देता है ज्ञान?
कौन सिखाता ये विज्ञान?
कौन सी है ये अद्भुत शक्ति,
अदृश्य, अति सुन्दर….
मधुमक्खी का कौशल,
है अति सराहनीय,
अति आकर्षक,
सर्वोत्कृष्ट रचना हैं माँ,
प्रतिकृति परमेश्वर की,
चट्टान से अटल पिता,
परम प्रभु जी का कृपा छत्र,
कृतघ्न हुआ है मानव,
नादान, लापरवाह,
वृद्धाश्रम में हमारे अपने हैं,
क्या वे हो गए हैं हमारे पराये?
ऐ मानव,
चेतो, जागो, सुनो हमारी बात,
भूलो मत प्रकृति के उपकार,
ईश समान मातु पिता के उपकार।।
