खुद से मिलन
मौन…
समझे कौन?
उफ़! इस शोर-शराबे में,
शब्द सभी हो गए थे गौण।
तभी कहीं से स्वर उभरा—
“कौन है, जो आया आज?”
कोलाहल के उस सागर में भी
किसी ने पढ़ लिए मन के राज।
मुड़कर देखा—न कोई अपना,
न कोई चेहरा, न कोई पास।
तभी अंतस ने धीरे से कहा—
“तू स्वयं ही है सबसे ख़ास।”
उस पल जैसे टूट गए
मन के सारे भ्रम-जाल।
जिसकी अपेक्षा थी जग से
मिला उत्तर जो भीतर का था सवाल।
फिर शब्द मौन से निकल पड़े,
भाव हुए निर्भय, निडर।
क्यों भटकूँ अब इधर-उधर,
जब मिल गया अपना ही घर।
स्वयं को पाकर जाना मैंने—
न कोई दूरी, न कोई बंधन।
सबसे अनुपम, सबसे पावन,
होता है खुद से अपना मिलन।
अब न शिकायत, न कोई प्रश्न,
न पाने-खोने का है डर।
जिसने स्वयं को जान लिया,
उससे सुंदर नहीं कोई सफ़र।
— सविता सिंह ‘मीरा’
